लाइव न्यूज़ :

संरक्षण की लड़ाई में बच्चों को नुकसान, कीमत चुकाते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा-माता पिता के प्यार और स्नेह से वंचित होते हैं

By भाषा | Updated: February 18, 2020 19:45 IST

शीर्ष अदालत ने बच्चों के अधिकारों का सम्मान करने की आवश्यकता पर जोर देते हुये कहा कि वे अपने माता पिता दोनों के प्यार और स्नेह के हकदार होते हैं। न्यायालय ने कहा कि विवाह विच्छेद से माता पिता की उनके प्रति जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है।

Open in App
ठळक मुद्देपीठ ने कहा कि संरक्षण के मामले पर फैसला करते समय अदालतों को बच्चे के सर्वश्रेष्ठ हित को ध्यान में रखना चाहिए।पीठ ने लंबे समय से वैवाहिक विवाद मे उलझे एक दंपति के मामले में अपने फैसले में यह टिप्पणियां कीं।

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि संरक्षण की लड़ाई में हमेशा ही बच्चों को नुकसान होता है और वे इसकी भारी कीमत चुकाते हैं क्योंकि वे इस दौरान अपने माता पिता के प्यार और स्नेह से वंचित रहते हैं जबकि इसमें उनकी कोई गलती नहीं होती है।

शीर्ष अदालत ने बच्चों के अधिकारों का सम्मान करने की आवश्यकता पर जोर देते हुये कहा कि वे अपने माता पिता दोनों के प्यार और स्नेह के हकदार होते हैं। न्यायालय ने कहा कि विवाह विच्छेद से माता पिता की उनके प्रति जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है।

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि संरक्षण के मामले पर फैसला करते समय अदालतों को बच्चे के सर्वश्रेष्ठ हित को ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि संरक्षण की लड़ाई में वही पीड़ित’ है और अगर मध्यस्थता की प्रक्रिया के माध्यम से वैवाहिक विवाद नहीं सुलझता है तो अदालतों को इसे यथाशीघ्र सुलझाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इसमें लगने वाले हर दिन के लिए बच्चा बड़ी कीमत चुका रहा होता है। पीठ ने लंबे समय से वैवाहिक विवाद मे उलझे एक दंपति के मामले में अपने फैसले में यह टिप्पणियां कीं।

पीठ ने कहा, ‘‘संरक्षण के मामले में इसका कोई मतलब नहीं है कि कौन जीतता है लेकिन हमेशा ही बच्चा नुकसान में रहता है और बच्चे ही इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं क्योंकि जब अदालत अपनी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उनसे कहती है कि वह माता पिता में से किसके साथ जाना चाहते हैं तो बच्चा टूट चुका होता है।’’ शीर्ष अदालत ने बच्चे के संरक्षण के मामले का फैसला करते हुये कहा , ‘‘बच्चे की भलाई ही प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा होता है और यदि बच्चे की भलाई के लिये आवश्यक हो तो तकनीकी आपत्तियां इसके आड़े नहीं आ सकतीं।’’

पीठ ने कहा, ‘‘हालांकि, बच्चे की भलाई के बारे में फैसला करते समय माता पिता में से किसी एक के दृष्टिकोण को ध्यान में नहीं रखना चाहिए। अदालतों को बच्चे के सर्वश्रेष्ठ हित को सर्वोपरि रखते हुये संरक्षण के मामले में फैसला करना चाहिए क्योंकि संरक्षण की इस लड़ाई में ‘पीडि़त’ वही है।’’

पीठ ने पेश मामले में कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले बच्चे के सर्वश्रेष्ठ हित को ध्यान में रखते हुये माता पिता के बीच विवाद सुलझाने का प्रयास किया था, लेकिन अगर पति पत्नी अलग होने या विवाह विच्छेद के लिये अड़े होते हैं तो बच्चे ही इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं और वे ही इसका दंश झेलते हैं।’’

न्यायालय ने कहा, ‘‘ऐसे मामले में फैसला होने में विलंब से निश्चित ही व्यक्ति को बड़ा नुकसान होता है और वह अपने उन अधिकारों से वंचित हो जाता है जो संविधान के तहत संरक्षित हैं और जैसे जैसे दिन गुजरता है तो वैसे ही बच्चा अपने माता पिता के प्रेम और स्नेह से वंचित होने की कीमत चुका रहा होता है जबकि इसमें उसकी कभी कोई गलती नहीं होती है लेकिन हमेशा ही वह नुकसान में रहता है। ’’

पीठ ने कहा कि इस मामले में शीर्ष अदालत ने विवाद का सर्वमान्य समाधान खोजने का प्रयास किया लेकिन माता-पिता का अहंकार आगे आ गया और इसका असर उनके दोनों बच्चों पर पड़ा। पीठ ने पति पत्नी के बीच छिड़ी वैवाहिक विच्छेद की जंग पर टिप्पणी करते हुये कहा कि इस दौरान उनके माता पिता अपने बच्चों के प्रेम और स्नेह से ही वंचित नहीं हुये बल्कि वे अपने पौत्र पौत्रियों के सानिध्य से भी वंचित होकर इस संसार से विदा हो गये पीठ ने कहा कि बहुत ही थोड़े ऐसे भाग्यशाली होते हैं जिन्हें अपने जीवन के अंतिम क्षणों में जिनके बच्चों को अपने दादा दादी का सानिध्य मिलता है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि सितंबर, 2017 में उसके अंतरिम आदेश में की गयी व्यवस्था और बाद के निर्देश जारी रहेंगे। न्यायालय ने इस अंतरिम आदेश में कहा था कि दशहरा, दीवाली और शरद अवकाश ये बच्चे किस तरह से अपने माता पिता के साथ रहेंगे।

न्यायालय ने संबंधित पक्षकारों को अवयस्क बच्चे के संरक्षण के लिये अलग से सक्षम अदालत में कार्यवाही शुरू करने की छूट प्रदान की। पीठ ने कहा कि पति द्वारा संबंधित अदालत में दायर तलाक की याचिका पर 31 दिसंबर, 2020 तक फैसला किया जाये। इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मार्च, 2017 में आदेश दिया था कि बच्चों को बोर्डिंग स्कूल में रखा जाये क्योंकि उनका अपने माता पिता में से किसी एक के पास रहना उनके लिये हितकारी नहीं है। 

टॅग्स :दिल्लीसुप्रीम कोर्टchildनरेंद्र मोदी
Open in App

संबंधित खबरें

भारतघायल हूं इसलिए घातक हूं?, राघव ने एक्स पर किया पोस्ट, मैं बोलना नहीं चाहता था, मगर चुप रहता तो बार-बार दोहराया गया झूठ भी सच लगने लगता, वीडियो

भारतअल्केमिस्ट एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड केस से अलग हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन, आखिर कारण

भारतLPG Cylinder Update: सिलेंडर के लिए अब लंबी वेटिंग खत्म! दिल्ली में बस ID कार्ड दिखाओ और 5KG सिलेंडर पाओ

ज़रा हटकेबनारस में सीएम यादव श्री राम भंडार में रुके और कचौड़ी, पूरी राम भाजी और जलेबी का स्वाद लिया?, वीडियो

भारतदिल्ली और उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में महसूस हुए भूकंप के झटके, अफगानिस्तान में आया भूकंप

भारत अधिक खबरें

भारतगोदाम में भर रहे थे नाइट्रोजन गैस?, विस्फोट में 4 की मौत और 2 घायल

भारतPAN Card Update: घर बैठे सुधारें पैन कार्ड में मोबाइल नंबर या नाम, बस 5 मिनट में होगा पूरा काम; देखें प्रोसेस

भारत'Three Allegations, Zero Truth': आम आदमी पार्टी द्वारा राज्यसभा की भूमिका से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा का जवाब

भारतMadhya Pradesh: अनूपपुर ज़िले में चार-मंज़िला होटल गिरने से मलबे में कई लोगों के फँसे होने की आशंका, एक की मौत

भारततमिलनाडु चुनावों के लिए BJP का टिकट न मिलने के बाद अन्नामलाई ने दिया अपना स्पष्टीकरण