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माउंट एवरेस्ट पर गंगाजल लेकर पहुंचे आईएएस अधिकारी रवीन्द्र कुमार, गंगा प्रकृति की ऐसी देन है, जिसे दोबारा हासिल नहीं किया जा सकेगा

By भाषा | Updated: June 5, 2019 16:10 IST

पर्यावरण दिवस के मौके पर बुधवार को कुमार ने अपने चुनौतीपूर्ण अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने दूसरा एवरेस्ट अभियान 23 मई को पूरा किया। 2011 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी कुमार, नदी एवं जल संरक्षण के प्रतीकात्मक संदेश के रूप में एवरेस्ट पर गंगाजल ले कर गये थे।

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ठळक मुद्देहिमालय भी पर्वतारोहण अभियानों की अधिकता के कारण मानव जनित अपशिष्ट से होने वाले प्रदूषण से मुक्त नहीं है।कुमार ने बताया कि एवरेस्ट के रास्ते में भी पर्वतारोहियों के शव मिलना सामान्य बात है।भारत में लगभग 40 प्रतिशत आबादी की प्यास गंगा ही बुझाती है और हिमालय गंगा सहित अन्य प्रमुख नदियों का उद्गम है।

विश्व के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर, माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने वाला, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का पहला अधिकारी होने का दावा करने वाले रवीन्द्र कुमार ने हिमालय के शिखर पर गंगाजल ले जाकर पर्यावरण, नदी और जल संरक्षण करने की अपील की है।

पर्यावरण दिवस के मौके पर बुधवार को कुमार ने अपने चुनौतीपूर्ण अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने दूसरा एवरेस्ट अभियान 23 मई को पूरा किया। 2011 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी कुमार, नदी एवं जल संरक्षण के प्रतीकात्मक संदेश के रूप में एवरेस्ट पर गंगाजल ले कर गये थे।

फिलहाल पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय में तैनात कुमार ने कहा कि उन्होंने एवरेस्ट से भारत और विश्व के लोगों से गंगा एवं हिमालय जैसी प्रकृति की अमूल्य धरोहरों के संरक्षण के लिये पानी का अपव्यय रोकने की अपील की।

2013 में एवरेस्ट पर पहुंचने के बाद वह यह उपलब्धि हासिल करने वाले, देश के पहले आईएएस अधिकारी बन गए

कुमार का दावा है कि 2013 में एवरेस्ट पर पहुंचने के बाद वह यह उपलब्धि हासिल करने वाले, देश के पहले आईएएस अधिकारी बन गए। दूसरे अभियान के बाद वह दुनिया के उन दर्जन भर लोगों में भी शुमार हो गये जो नेपाल और चीन, दोनों तरफ से एवरेस्ट पर पहुचंने में कामयाब रहे। यह उपलब्धि हासिल करने वालों में विश्व के मशहूर पर्वतारोही कुशांग शेरपा और लवराज सिंह शामिल हैं।

कुमार ने बताया कि पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय की ‘नमामि गंगे’ मुहिम में काम करने के दौरान उन्हें नदियों की बदहाली से प्रकृति और जीव जगत हो रहे नुकसान का अहसास हुआ। मंत्रालय के जल संरक्षण से जुड़े अन्य अभियानों से प्रेरित होकर उन्होंने एवरेस्ट पर गंगाजल ले जाकर दुनिया से नदियों को बचाने की अपील करने का संकल्प लिया था।

उन्होंने बताया, ‘‘गंगा प्रकृति की ऐसी देन है, जिसे एक बार नष्ट होने पर दुनिया की किसी भी तकनीक से दोबारा हासिल नहीं किया जा सकेगा। गंगा एवं अन्य जीवनदायिनी नदियों को दूषित करने में हम सभी का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष योगदान है। इसलिये इसकी भरपाई भी हम सभी को मिलकर करनी होगी।’’

उन्होंने बताया कि हिमालय भी पर्वतारोहण अभियानों की अधिकता के कारण मानव जनित अपशिष्ट से होने वाले प्रदूषण से मुक्त नहीं है। इसमें बर्फ में दफन पर्वतारोहियों के दशकों पुराने शव इस स्थिति की भयावयता को उजागर करते हैं।

कुमार ने बताया कि एवरेस्ट के रास्ते में भी पर्वतारोहियों के शव मिलना सामान्य बात है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘‘एवरेस्ट: सपनों की उड़ान, सिफर से शिखर तक’’ में भी पिछले कई दशक से एवरेस्ट के मार्ग में लगभग 200 शव मौजूद होने का जिक्र किया है।

एवरेस्ट पर गंगाजल ले जाने की वजह के सवाल पर कुमार ने कहा, ‘‘भारत में लगभग 40 प्रतिशत आबादी की प्यास गंगा ही बुझाती है और हिमालय गंगा सहित अन्य प्रमुख नदियों का उद्गम है। इसलिये गंगाजल को जल संरक्षण का प्रतीक मानकर मैंने हिमालय के शिखर से लोगों से पानी, पर्यावरण और नदियों के संरक्षण की अपील की।’’

उन्होंने कहा कि सरकार की कोई भी मुहिम जनभागीदारी के बिना सफल नहीं हो सकती है। क्योंकि जल, जंगल और जमीन सहित सभी प्राकृतिक संसाधनों का दोहन लोगों की खातिर लोग ही करते हैं इसलिये लोगों की प्रत्यक्ष एवं सक्रिय भागीदारी ही इनके संरक्षण का एकमात्र उपाय है। 

 

 

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