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नहीं चाहते गैर सरकारी संगठन उच्च न्यायिक सेवा नियमों को चुनौती दें: न्यायालय

By भाषा | Updated: September 5, 2021 17:44 IST

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उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वह नहीं चाहता कि ‘व्यस्त रहने वाले’ गैर सरकारी संगठन ‘एनजीओ’ उत्तर प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा नियमों के प्रावधानों को चुनौती दें और उनके बजाए वह असंतुष्ट उम्मीदवारों की बात सुनना चाहेगा। ये नियम सभी श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम योग्यता नियत करते हैं। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने तीन सितंबर को पारित आदेश में कहा, ‘‘संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत हम विशेष अनुमति याचिका स्वीकार नहीं करना चाहते। विशेष अनुमति याचिका खारिज की जाती है।’’ गैर सरकारी संगठन संविधान बचाओ ट्रस्ट की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक कुमार शर्मा ने कहा कि उत्तर प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा नियमों के नियम 18 में सामान्य/अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति सभी श्रेणियों के अभ्यर्थियों के लिए एक न्यूनतम योग्यता निर्दिष्ट है और इसलिए इससे आरक्षण का उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाता है। जनहित याचिका को रद्द करने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को एनजीओ ने चुनौती दी है। पीठ ने कहा, ‘‘संविधान बचाओ ट्रस्ट क्या है, एक एनजीओ? हम नहीं चाहते कि कोई व्यस्त संस्था उच्च न्यायिक सेवा नियमों को चुनौती दे। कुछ शिकायती अभ्यर्थी हमारे पास आएं, हम उनका पक्ष सुनेंगे।’’ शर्मा ने कहा कि उच्च न्यायालय ने इसे सेवा का विषय मानते हुए और इसे खारिज करके भूल की है। उन्होंने दलील दी कि यह जनहित याचिका है क्योंकि प्रावधान समाज के सभी वर्गों को प्रभावित करते हैं। तब पीठ ने शर्मा से पूछा कि क्या किसी शिकायती अभ्यर्थी को याचिका में पक्ष बनाया गया है तो वरिष्ठ वकील ने ‘नहीं’ में जवाब दिया। पीठ ने कहा, ‘‘शिकायती अभ्यर्थी हमारे समक्ष आएं, हम उनका पक्ष सुनेंगे, आपका नहीं।’’ एनजीओ ने अपनी अपील में कहा कि 2012 से उच्च न्यायिक सेवाओं में सभी श्रेणियों में विज्ञापित कुल 75 रिक्त पदों में से 73 पद अब भी खाली हैं और उन्हें आगे बढ़ाया जा रहा है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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