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भारत में इस वजह से बढ़ रहे हैं आनुवंशिक रोग, 80 फीसदी बच्चे पीड़ित, ये खास उपाय दिला सकता है छुटकारा

By उस्मान | Updated: November 8, 2019 15:11 IST

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत के अस्पतालों में नवजात बच्चों की अनिवार्य जांच का प्रावधान हो तो बीमारी का आसानी से पता किया जा सकता है

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ठळक मुद्देसिर्फ तीन से साढ़े तीन फीसद आबादी ही इन बीमारियों के बारे में जानती हैभारत में दुर्लभ आनुवंशिक गड़बड़ी के 80 फीसद मामले बच्चों के

भारत में दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों का बोझ पूरी तरह सामने नहीं आ पाता क्योंकि अधिकतर माता-पिता को ऐसी बीमारियों के होने के बारे में पता ही नहीं रहता। ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने ऐसी बीमारियों को लेकर देश के सभी बड़े सार्वजनिक अस्पतालों में नवजातों की अनिवार्य जांच की वकालत की है। कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि जब तक ऐसा नहीं किया जाता तब तक भारत में दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों की दर को घटाने के लिए बनाई गईं नीतियां निष्प्रभावी होंगी। 

देश में स्थिति की निगरानी से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक औसतन, भारत में सिर्फ तीन से साढ़े तीन फीसद आबादी ही इन बीमारियों के बारे में जानती है। बीते कुछ साल में दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों के साल में चार से पांच मामले सामने आते थे लेकिन अब लगभग इतने ही मामले हर महीने सामने आ रहे हैं। 

संडोर लाइफ साइंसेज, हैदराबाद में परामर्शदाता राधा रमादेवी ने कहा कि शुरुआती जांच से गरीब मरीजों पर आने वाले खर्च को कम करने में भी मदद मिलेगी जिनके पास बीमारी बढ़ने के बाद इसका पता चलने पर विकल्प कम होते हैं। इस बात से लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर सपोर्ट सोसाइटी (एलएसडीएसएस) के सचिव शशांक त्यागी भी सहमत हैं। 

त्यागी ने कहा, 'भारत में दुर्लभ आनुवंशिक गड़बड़ी के 80 फीसद मामले बच्चों के हैं और इन्हें संभालना बेहद मुश्किल है। विशेषज्ञों तथा ऐसे स्वास्थ्य केंद्रों की कम संख्या मरीजों की मुश्किलें और बढ़ा देती है। इलाज और दवाओं तक उनकी पहुंच भी मुश्किल होती है।' 

चेन्नई में क्रिश्चन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में नैदानिक आनुवंशिकी विभाग की प्रमुख सुमिता डांडा ने अपनी बात रखने के लिए पश्चिम बंगाल के मालदा की आठ वर्षीय बच्ची का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि लड़की के माता-पिता को सही बीमारी का पता लगाने में चार साल का वक्त लग गया। उनकी बेटी गौचर रोग से पीड़ित थी जो एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है जिसमें खून की कमी, थकान, कम प्लेटलेट्स, प्लीहा और यकृत बढ़ना जैसे लक्षण नजर आते हैं। ये ग्लूकोसेरेब्रोसीडेस एंजाइम की जीन इनकोडिंग में बदलाव की वजह से होता है। 

डांडा ने बताया कि इस एंजाइम की गैर-मौजूदगी या कम मात्रा से कोशिकाओं में अनावश्यक चीजें इकट्ठी होती जाती हैं जिससे बीमारी के लक्षण सामने आते हैं। लड़की के माता-पिता कई चिकित्सकों को दिखाते रहे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और कई साल तक उनका मानना था कि वह पाचन संबंधी सामान्य समस्याओं से जूझ रही है। 

डांडा ने कहा कि बच्ची के बार-बार बीमार पड़ने पर उसके माता-पिता उसे इलाज के लिए जर्मनी लेकर गए और वहां अंतत: डॉक्टरों ने पता लगाया कि उसमें कमजोरी लाने वाली गौचर बीमारी है। 

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत के अस्पतालों में नवजात बच्चों की अनिवार्य जांच का प्रावधान हो तो बीमारी का आसानी से पता किया जा सकता है और समस्या की पहचान शुरुआती चरण में ही हो सकती है। बढ़ती जागरूकता के साथ ही गौचर बीमारी को लेकर लोगों में जागरूकता भी आ रही है। 

अब इसके इलाज की रणनीति - एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ईआरटी) भी है। भारत में दुर्लभ बीमारियों से जुड़े संगठन के मुताबिक देश में अभी दुर्लभ बीमारियों के करीब 8,000 मरीज हैं। इन बीमारियों में हंटर सिंड्रोम, गौचर और फैब्री आदि शामिल हैं।  

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