सुल्तानगंजः बिहार में भागलपुर जिले के सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय में हुए सनसनीखेज गोलीकांड के मुख्य अभियुक्त रामधनी यादव की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई, लेकिन इस एनकाउंटर के बाद अब जो परतें खुल रही हैं, उन्होंने पूरे इलाके की सियासत और अपराध के गठजोड़ को बेनकाब कर दिया है। कहानी सिर्फ एनकाउंटर तक सीमित नहीं है, असल अदावत की जड़ें सुल्तानगंज की सियासी और आर्थिक सत्ता के तिलिस्म में छिपी हैं। इलाके में रामधनी यादव की खौफ की हुकूमत चलती थी। दरअसल, मंगलवार की शाम, सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय में माहौल था टेंडर और ठेके की बोली लगने वाली थी। परिषद के अध्यक्ष राजकुमार उर्फ गुड्डू के कमरे में 12-15 लोग मौजूद थे। तभी अचानक दरवाजा खुलता है, रामधनी यादव की सफेद शर्ट, खाकी हाफ पैंट और हरे झोले के साथ एंट्री होती है।
लेकिन कमरे में सन्नाटा और फिर रामधनी का डायलॉग सुल्तानगंज में सिर्फ तुम ही राज करोगे क्या? इसके बाद जो हुआ, वो किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था। झोले से कट्टा निकला और शुरू हो गई फायरिंग। अध्यक्ष को दो गोलियां लगीं और अफरा-तफरी मच गई। बीच-बचाव करने पहुंचे कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार भी रामधनी के निशाने पर आ गए और एक गोली ने उनकी जिंदगी खत्म कर दी।
पूरा मंजर सीसीटीवी में कैद हो चुका था और यहीं से शुरू हुआ पुलिस का शिकंजा। बताया जाता है कि रामधनी यादव एक ऐसा नाम था, जिसकी शुरुआत दूध बेचने से हुई थी। लेकिन अंत खून-खराबे में हुआ। साल 2000 में एक कारोबारी की हत्या के बाद सिर काटकर थाने पहुंचना और जेल जाना फिर जमानत। यहीं से अपराध की दुनिया में वापसी हुई रामधनी यादव की।
2002-03 तक हत्या, लूट, रंगदारी के कई केस। फिर राजनीति से नजदीकी। पत्नी नीलम देवी को पार्षद बनवाना। फिर उपाध्यक्ष की कुर्सी और खुद बन गया सुल्तानगंज का अनौपचारिक शासक। घाट, पार्किंग, बस स्टैंड हर जगह उसका सिक्का चलता था। करोड़ों की संपत्ति अर्जित करने के साथ ही नेताओं से रिश्ते और जमीन पर खौफ का राज।
इस बीच रामधनी यादव का कनबुच्चा यादव के बीच सालों पुरानी दुश्मनी सामने आने लगी। स्थानीय जानकारों के मुताबिक, नगर परिषद की सत्ता दो धड़ों-कनबुच्चा यादव गिरोह और रामधनी यादव गिरोह के बीच लंबे समय से बंटी हुई थी। जो भी अधिकारी यहां आता था, उसे पहले ही दो ध्रुवों की हकीकत समझा दी जाती थी। दोनों गुटों से तालमेल बैठा लिया जाए तो काम आसान, वरना टकराव तय माना जाता था।
सूत्रों के अनुसार, पिछले तीन महीनों से रामधनी यादव की कमाई के सभी रास्ते घाट, सैरात और पार्किंग से होने वाली आमदनी पर रोक लग गई थी। इससे उसके आर्थिक और राजनीतिक दबदबे को बड़ा झटका लगा था। बताया जाता है कि नगर परिषद में अब कनबुच्चा यादव का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था, जिससे शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल गया।
यही नहीं, 2023 से दोनों गुटों के बीच खूनी संघर्ष पहले से ही जारी था। 24 फरवरी 2023 को रामधनी यादव पर जानलेवा हमला हुआ था और 5 नवंबर 2023 को रंजीत यादव पर भी हमला किया गया था। दोनों घटनाओं में एक-दूसरे के गिरोह पर आरोप लगे थे, जिससे रंजिश और गहरी होती चली गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नगर परिषद सुल्तानगंज अब अपराध और सत्ता के गठजोड़ का अड्डा बनता जा रहा था। घाट की वसूली से लेकर पार्किंग और सैरात तक हर आर्थिक स्रोत पर वर्चस्व की लड़ाई ने हालात को विस्फोटक बना दिया था। फिलहाल इलाके में तनाव और सन्नाटा दोनों साथ-साथ हैं। जानकारों के अनुसार सुल्तानगंज की यह अदावत अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, बल्कि इसकी परछाइयां अभी और कई परतें खोल सकती हैं।