गानों की लोकप्रियता में क्या शालीनता का दम घुट रहा है ?
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 29, 2026 07:38 IST2026-04-29T07:38:08+5:302026-04-29T07:38:42+5:30
बिहार के पुलिस महानिदेशक ने हाल ही में एक आदेश जारी किया कि अश्लील और द्विअर्थी गानों या फिर किसी जाति पर आक्षेप वाले गानों को बजने नहीं दिया जाए. मगर इस मामले में एक भी कार्रवाई नहीं हुई है.

गानों की लोकप्रियता में क्या शालीनता का दम घुट रहा है ?
एक गाने में अश्लीलता और महिलाओं को गलत तरीके से दर्शाने के मामले में महिला आयोग ने आपत्ति ली तो अभिनेता संजय दत्त ने माफी भी मांग ली और यह वादा भी किया कि वे 50 आदिवासी लड़कियों की शिक्षा का खर्च उठाएंगे. सरके चुनर के बोल वाला यह गाना एक कन्नड फिल्म का है और कहा जा रहा है कि गाने के वीडियो को सोशल प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया है.
यह कोई पहला मामला नहीं है जब किसी फिल्म के गाने में अश्लीलता का मामला सामने आया हो. ऐसे गानों की भरमार है जिनके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं और कमाल की बात है कि लोग ऐसे गानों को पसंद भी कर रहे हैं. लाखों की संख्या में लाइक्स भी मिलते हैं. खास कर क्षेत्रीय फिल्मों में तो इस तरह के गाने ही ज्यादा प्रचलित हो रहे हैं. इस तरह के गानों ने सबसे ज्यादा कोहराम भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में मचाया हुआ है.
न केवल फिल्में बल्कि सार्वजनिक स्टेज पर जब इस तरह के गाने लोकगीत के नाम पर गाये जाते हैं तो लोग हजारों की संख्या में मतवालों की तरह झूमते हैं. इसीलिए गाना लिखने वाले व्यक्ति या गाने वाले का सीधा जवाब होता है कि लोग सुनते हैं, इसलिए गाने लिखे और गाये जा रहे हैं. लेकिन क्या यह जवाब संतोषजनक है? और इसका समाधान क्या निकाला जाना चाहिए?
इसका जवाब किसी के पास नहीं है. फिल्मों से अलग ऐसे वीडियो गीतों की भरमार है जो सीधे-सीधे अश्लीलता के दायरे में आते हैं. बिहार जैसे राज्य में तो गाने का एक नया राजनीतिक पैटर्न भी चल पड़ा है. जाति से जुड़े नेताओं को लेकर गीत रचे जा रहे हैं. किसी नेता की गाथा गाई जाए, इससे किसी को आपत्ति नहीं होगी लेकिन जब दूसरे नेता को नीचा दिखाने के लिए गीत लिखे और गाये जाएं तो स्वाभाविक रूप से इसकी प्रतिक्रिया होगी.
अभी हाल ही में बिहार के एक कस्बे में दो जातियों के लोगों के बीच पथराव और मारपीट की घटना हुई क्योंकि एक पक्ष दूसरी जाति की बस्ती के बीच से खुद के नेता की महानता का गीत बजाते हुए निकला. अब सवाल है कि ऐसे मामलों में क्या किया जाए? सीधा सा जवाब है कि कानूनी रूप से सख्ती की जानी चाहिए. लेकिन सख्ती कौन करे? बिहार के पुलिस महानिदेशक ने हाल ही में एक आदेश जारी किया कि अश्लील और द्विअर्थी गानों या फिर किसी जाति पर आक्षेप वाले गानों को बजने नहीं दिया जाए. मगर इस मामले में एक भी कार्रवाई नहीं हुई है.
निश्चित रूप से देश के दूसरे राज्यों में भी इस तरह की या फिर इससे मिलती-जुलती समस्याएं हैं. विडंबना यह है कि समस्याओं से निपटने की कोई सार्थक कोशिश नहीं की जा रही है. यदि कोई व्यक्ति ऐसे गीत लिखता है या गाता है तो क्या उसे पता नहीं है कि यह समाज के लिए अहितकर है? ध्यान रखिए कि जिस समाज की शालीनता क्षतिग्रस्त होती है, वह कमजोर होता चला जाता है. शालीनता किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति है. इसे हमें बचाना ही होगा अन्यथा हम कमजोर होते चले जाएंगे.