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विषाकत जीवणुओं में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने का खतरा, संसथानों को मजबूत करना जरूरी: नीति आोग

By भाषा | Updated: December 17, 2020 21:14 IST

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नयी दिल्ली, 17 दिसंबर फंगी जैसे सूक्ष्मजीवों और विषाणुओं में दवाओं के प्रति प्रतिरोध (एएमआर) क्षमता बढ़ने से उनके जटिल होने का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में इस प्रकार के प्रतिरोधों का पता लगाने को लेकर संबंधित नोडल संस्थानों को मजबूत बनाने और उनमें समुचित कार्यबल रखने की जरूरत है।

नीति आयोग की-‘दृष्टिकोण 2035: भारत में जन स्वास्थ्य निगरानी : श्वेत पत्र’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट के अनुसार एएमआर को लेकर भारत में जो आंकड़े हैं, वे काफी कम और अपर्याप्त हैं तथा उसके आधार पर कोई ठोस आकलन या हस्तक्षेप करना मुश्किल है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि महत्वपूर्ण खतरा सूक्ष्मजीवों में प्रतिरोधक क्षमता का बढ़ना और उसके कारण जटिलताओं का बढ़ना है।

सूक्ष्म जीवों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने का मतलब है कि काटीणुओं, विषाणुओं व फंगी (फफूंद) जैसे जीवाणुओं में इस प्रकार का बदलाव आता है, जिससे उनके संक्रमण से उत्पन्न रोगों के इलाज में प्रयोग की जाने वाले दवाएं प्रभावी नहीं रह जाती।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘सूक्ष्म जीवों में जीन के स्तर पर जो बदलाव आ रहे हैं, उनमें जो प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही है, उसका पता लगाने के लिये मानव संसाधन, बुनियादी ढांचा के साथ नोडल संस्थानों को मजबूत बनाने की जरूरत है।’’

आयोग ने कहा कि 2008 में पहली बार एक खास प्रकार का जीन (वंशाणु) भारतीय मूल के स्वीडन के एक मरीज में पाया गया। उसने उस साल भारत की यात्रा की थी। उसके बाद 2019 में आर्कटिक में यह पाया गया। इस दौरान यह जीन 100 से अधिक देशों में नये-नये रूप में पाया गया। यह बताता है कि सूक्ष्म जीवों में प्रतिरोधक क्षमता तेजी से बढ़ रही है।

इसमें कहा गया है, ‘‘एएमआर का एक प्रमुख कारण खुद से दवा लेना है। इससे एंटीबॉयोटिक का जरूरत से अधिक उपयोग या दुरूपयोग होता है।’’

डॉक्टर की सलाह के बिना दवा दुकानों या ‘नीम-हकीम’ से पूछकर एंटीबॉयोटिक का उपयोग तथा बिना जानकारी के इसके लेने से औषधि के प्रभाव कम हो रहे हैं और इससे सूक्ष्मजीवों की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ रही है।

रिपोर्ट के अनुसार इसके अलावा कृषि क्षेत्र में एंटीबॉयोटिक के उपयोग से भी औषधि की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है।

आयोग ने रिपोर्ट में कहा है कि भारत में एएमआर का बोझ काफी ज्यादा है। ‘‘लेकिन विस्तृत आंकड़े के अभाव में इस बोझ का आकलन करना कठिन है।’’

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के लिये एएमआर एक प्राथमिकता वाला क्षेत्र है। संगठन ने इस चुनौती से पार पाने के लिये ‘एक-सवास्थ्य’ रुख के साथ सभी पक्षों के मिलकर इस पर काम करने का आह्वान किया है।

उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने अप्रैल 2017 में एएमआर पर राष्ट्रीय कार्य योजना शुरू की थी। इसमें मानव स्वास्थ्य, पशुपालन, उद्योग और पर्यावरण क्षेत्र में ‘एक-स्वास्थ्य’ दृष्टिकोण के साथ एएमआर से निपटने की जरूरत को रेखांकित किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार आईसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) 25 सार्वजनिक और निजी अस्पतालों तथा प्रयोगशालाओं से एएमआर आंकड़े एकत्रित करता है। ‘‘भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिये इसका दायरा तत्काल बढ़ाने की जरूरत है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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