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13 साल की उम्र में कथक शिक्षक बन गए थे बिरजू महाराज, अपनी कोरियोग्राफी से कई बॉलीवुड गानों को 'क्लासिक' बनाया

By अनिल शर्मा | Updated: January 17, 2022 11:49 IST

सोमवार तड़के बिरजू महाराज का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वे कथक नृतकों के महाराज परिवार से थे और कथक के लखनऊ कालका-बिन्दादीन घराने से ताल्लुक रखते थे।

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ठळक मुद्दे बिरजू महाराज को साल 1986 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया थावे कथक के लखनऊ कालका-बिन्दादीन घराने से ताल्लुक रखते थे

नई दिल्लीः पद्म विभूषण से सम्मानित मशहूर कथक डांसर पंडित बिरजू महाराज नहीं रहे। अगले महीने वह 84 साल के होते। उनका जन्म 4 फरवरी 1938 को लखनऊ में हुआ था। परिवार ने कहा है कि रात के वक्त वह अंताक्षरी खेल रहे थे, तभी उन्हें कुछ परेशानी हुई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन वे बच नहीं पाए।

 बिरजू महाराज कथक नृतकों के महाराज परिवार से थे और कथक के लखनऊ कालका-बिन्दादीन घराने से ताल्लुक रखते थे। इनके दो चाचा और ताऊ शंभूमहाराज और लच्छु महाराज तथा उनके खुद के पिता और गुरु महाराज भी आते हैं। लेकिन इनका पहला जुड़ाव नृत्य से ही रहा।

पिता और चाचा ही बिरजू महाराज के गुरु रहे। पहली प्रस्तुति 7 साल की उम्र में दी थी। जब 9 साल के हुए तो पिता दुनिया से रुख्सत कर गए। इसके बाद परिवार लखनऊ से दिल्ली आ गया। यहां उन्होंने दिल्ली संगीत भारती में बतौर कथक शिक्षक नियुक्त हुए। उस वक्त बिरजू महाराज की उम्र सिर्फ 13 साल थी। 

बिरजू महाराज का बॉलीवुड से भी खास नाता रहा। उन्होंने अपनी कोरियोग्राफी से हिंदी फिल्मों के कई गीतों को क्लासिक बनाने का काम किया। उन्होंने सत्यजीत राय सहित मौजूदा दौर के फिल्मकारों के साथ काम किया।

सत्यजीत राय की फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में उन्होंने दो गानों को संगीतबद्ध किया और अपनी आवाज भी दी। वहीं दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म देवदास के गाने- काहें छेड़े मोहे को कोरियोग्राफ किया। संजय लीला भंसाली की चर्चित फिल्म बाजीराव मस्तानी के गाने दीवानी को भी बिरजू महाराज ने ही कोरियोग्राफ किया था। यह गाना दीपिका पादुकोण पर फिल्माया गया था। इसके साथ ही डेढ़ इश्किया, उमराव जान सहित कई बॉलीवुड फिल्मों में अपने नृत्य निर्देशन से उसे एक अलग मुकाम दिया।

उनके काम और उपलब्धियों के लिए साल 1986 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसी साल मध्य प्रदेश सरकार ने उनके शास्त्रीय नृत्य के लिए वर्ष 1986 का कालिदास सम्मान प्रदान किया। 24 फरवरी, 2000 को उन्हें प्रतिष्ठित संगम कला पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। 

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