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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: अफगान संकट पर चुप न रहे भारत

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: May 13, 2021 16:32 IST

अफगानिस्तान से फौजी वापसी की इच्छा बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रम्प दोनों ने जताई थी. वैसे तालिबान को शक है कि अमेरिका अफगानिस्तान में डटे रहना चाहता है.

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यह गनीमत है कि ईद के मौके पर अफगानिस्तान के तालिबान और सरकार ने तीन दिन के लिए युद्ध-विराम की घोषणा कर दी है. पिछली एक मई से अफगानिस्तान के विभिन्न शहरों में तालिबान ने इतने हमले किए हैं कि जितने उन्होंने पिछले एक साल में भी नहीं किए. 

पिछले साल फरवरी में तालिबान और अफगानिस्तान की गनी सरकार के बीच जो समझौता हुआ था, वह अब हवा में उड़ गया है. यह समझौता अमेरिका की पहल पर कतर की राजधानी दोहा में हुआ था. इस समझौते के मुताबिक 1 मई 2021 को अफगानिस्तान से सारी विदेशी फौजों को वापस चले जाना था. 

यह समझौता ट्रम्प-प्रशासन ने करवाया था लेकिन बाइडेन-प्रशासन ने इसकी तारीख बदल दी. उसने घोषणा की कि 1 मई को नहीं, अब अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान से 11 सितंबर 2021 को वापस लौटेंगी. यह वह दिन है, जिस दिन तालिबान ने अमेरिका पर हमला किया था.

तालिबानी इस तिथि-परिवर्तन से बेहद नाराज हैं. इसलिए 1 मई के बाद तालिबान ने अफगानिस्तान में लगातार हमले बोल रखे हैं. बाइडेन-प्रशासन ने गनी-सरकार को भरोसा दिलाया है कि 11 सितंबर के बाद भी अमेरिका अफगानिस्तान का ख्याल रखेगा. उसे वह आतंकवादियों के हवाले नहीं होने देगा. 

अफगानिस्तान से फौजी वापसी की इच्छा ओबामा और ट्रम्प, दोनों प्रशासनों ने व्यक्त की थी और उसके आधार पर अमेरिकी जनता के वोट भी जुटाए थे लेकिन तालिबान को शक है कि अमेरिका अफगानिस्तान में डटे रहना चाहता है. उसका कारण तो यह है कि परमाणु समस्या पर अभी तक दोनों देश, अमेरिका और ईरान उलझे हुए हैं और रूस के साथ भी अमेरिका की तनातनी चली आ रही है. 

चीन के साथ भी अमेरिका की कूटनीतिक मुठभेड़ तो जग-जाहिर है. ऐसी हालत में अफगानिस्तान में टिके रहना उसे अपने राष्ट्रहित की दृष्टि से जरूरी लग रहा है. यद्यपि अफगानिस्तान बहुत ही गहन राष्ट्रवादी देश है लेकिन पाकिस्तान तालिबान के जरिए वहां अपना वर्चस्व कायम करना चाहेगा. 

पाकिस्तानी वर्चस्व फिलहाल अफगानिस्तान में रूस और चीन का मार्ग प्रशस्त कर सकता है. यह गणित भारतीय विदेश मंत्रालय के दिमाग में भी हो सकता है.

इस मौके पर, जबकि तालिबान के लगातार हमले हो रहे हैं, पाक सेनापति और गुप्तचर-प्रमुख की काबुल-यात्रा का अभिप्राय क्या है? क्या वे तालिबान को चुप कराने और गनी सरकार का मनोबल बढ़ाने के लिए गए हैं? यह एक पहेली है. इस मौके पर भारत सरकार का मौन और उदासी भी एक पहेली है.

 

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