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जिसे जन्म दिया, वही तबाह कर रहा है!

By विकास मिश्रा | Updated: March 3, 2026 13:57 IST

मुल्ला उमर नाम के एक शख्स की पाकिस्तान ने पीठ थपथपाई और उसने छात्रों के समूह को एकत्रित करके तालिबान का गठन किया.

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ठळक मुद्देसोवियत संघ और स्थानीय लड़ाकों के बीच करीब दस साल तक लड़ाई चली. मुजाहिदीन शिविरों में प्रशिक्षण भी दिया. यह सब करीब-करीब खुलेआम हो रहा था.

तालिबान और पाकिस्तान में आखिर ऐसे हालात कैसे पैदा हो गए कि दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन बैठे? यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि तालिबान को जन्म देने में सबसे बड़ी भूमिका तो पाकिस्तान की ही रही है! उसी ने उसे पाला-पोसा है. एक समय तालिबान बड़ा दुलारा था पाकिस्तान का! आज वही तालिबान पाकिस्तान पर हमले कर रहा है और पाकिस्तान उस पर बम बरसा रहा है! किसी को पता नहीं कि हालात और कितने बिगड़ेंगे. मगर एक बात तो तय है कि तालिबान का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा पाकिस्तान. चलिए सबसे पहले तालिबान के जन्म पर गौर करते हैं. सोवियत रूस ने वामपंथ को मजबूत करने के लिए 1979 में अफगानिस्तान पर हमला किया लेकिन उसे अफगानी सरदारों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. सोवियत संघ और स्थानीय लड़ाकों के बीच करीब दस साल तक लड़ाई चली.

अमेरिका ने पर्दे के पीछे से स्थानीय लड़ाकों को न केवल बड़ी संख्या में हथियार उपलब्ध कराए बल्कि अकूत पैसा भी दिया. यह सब पाकिस्तान के जरिये हो रहा था. अंतत: 1989 में सोवियत संघ वापस लौट गया लेकिन देश के भीतर गृह युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए. इसी दौरान मुल्ला उमर नाम के एक शख्स की पाकिस्तान ने पीठ थपथपाई और उसने छात्रों के समूह को एकत्रित करके तालिबान का गठन किया.

यह सब पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तानी सेना की देखरेख में हो रहा था. तालिबान के लिए पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका खूब धन खर्च कर रहा था. यहां तक कि मुल्ला उमर के लड़ाकों को पाकिस्तानी सेना ने मुजाहिदीन शिविरों में प्रशिक्षण भी दिया. यह सब करीब-करीब खुलेआम हो रहा था.

चूंकि अफगानिस्तान की जनता गृह युद्ध से तंग आ चुकी थी इसलिए तालिबान को उसने अपने रक्षक के रूप में देखा और समर्थन किया. इसका नतीजा यह हुआ कि 1996 में तालिबान सत्ता में आ गया. उस दौरान तालिबान को सबसे पहले राजनयिक मान्यता देने वालों में पाकिस्तान भी था. उसी के आग्रह पर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने भी तालिबान को मान्यता दी थी.

पाकिस्तान को पूरी उम्मीद थी कि तालिबान उसके लिए ‘क्या हुक्म मेरे आका’ वाली भूमिका में रहेगा लेकिन 2001 में एक बड़ी घटना हो गई. तालिबान ने अलकायदा को पाल रखा था और अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका पर 9/11 की घटना को अंजाम दे दिया. बौखलाए अमेरिका ने तालिबान को आदेश दिया कि वह लादेन को सौंप दे अन्यथा अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे.

तालिबान नहीं माना और अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया. इसमें पाकिस्तान को मजबूरी में अमेरिका के साथ होना पड़ा लेकिन उसने दोहरा रवैया अपनाया. एक तरफ वह अमेरिका के साथ था तो दूसरी ओर क्वेटा और पेशावर जैसे शहरों में पाकिस्तान ने तालिबान के नेताओं के लिए सुरक्षित पनाहगाहें उपलब्ध कराईं. यहां तक कि ओसामा बिन लादेन भी पाकिस्तान में ही छिपा बैठा था.

यह बात अमेरिका को भी पता थी और तालिबान भी समझ रहा था कि पाकिस्तान दोहरा रोल निभा रहा है. मगर तालिबान ने चुप्पी साधे रखी. अमेरिका के खिलाफ तालिबान का संघर्ष चलता रहा मगर अमेरिका ने जैसे ही अफगानिस्तान से लौटने का निर्णय लिया तो तालिबान को देश पर कब्जा जमाने में थोड़ा भी वक्त नहीं लगा.

तब जीत का जश्न मनाने पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के लोग अफगानिस्तान गए थे. तालिबान की जीत के बाद पाकिस्तान को लगा कि अब तो दोनों हाथों में लड्डू है! तालिबानियों को सत्ता मिल गई है तो अब इस्लाम के नाम पर इनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जा सकता है. 1999 में जब भारतीय आईसी 814 विमान का अपहरण किया गया था तो आतंकियों का गंतव्य अफगानिस्तान ही था!

मगर तालिबान के नेताओं का नजरिया साफ था. पाकिस्तान के कमीनेपन के वे शिकार थे इसलिए उन्होंने साफ कह दिया कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है और उससे उनका कोई लेना-देना नहीं है! दरअसल तालिबान के नेता इस बात को अच्छी तरह समझ गए कि उन्हें पाकिस्तान के झांसे में नहीं आना है.

भारत के साथ रिश्ते अच्छे रखने हैं ताकि अफगानिस्तान में मदद के लिए भारत जो प्रोजेक्ट चला रहा है, उसे पूरा करे. पाकिस्तान तो कंगाल देश है, वह क्या मदद करेगा? वैसे भी अफगानिस्तान और भारत के बीच भाईचारे का बहुत पुराना इतिहास है. अफगानियों को हमारे देश में काबुलीवाला नाम से इज्जत बख्शी जाती रही है.

यही कारण है कि आज भी यदि कोई भारतीय अफगानिस्तान जाता है तो उसे बड़ी इज्जत की नजर से देखा जाता है जबकि पाकिस्तान के लोगों को वे दुश्मन मानते हैं. तो पाकिस्तान को जब लगा कि तालिबान उसकी बात नहीं मानने वाला है तो उसने नकेल कसने की कोशिश की लेकिन अफगानियों की खासियत है कि वे किसी के आगे झुकते नहीं है.

तालिबान ने कह दिया कि डूरंड सीमा रेखा को नहीं मानते. फिर तनाव बढ़ता चला गया. इस बीच पाकिस्तान में सक्रिय तहरीक ए तालिबान ने पाकिस्तानी सेना की नाक में दम कर रखा है. फिलहाल जो तकरार प्रारंभ हुई है, वह बहुत घातक है. यदि कुछ लोगों की सोच हो कि अफगानिस्तान के पास पाकिस्तान जैसी ताकत नहीं है तो  वे शायद यह भूल रहे हैं कि जमीनी लड़ाई में उसे हरा पाना टेढ़ी खीर है.

जब अमेरिका ने उसके आगे घुटने टेक दिए तो पाक किस खेत की मूली है? और हां, पाकिस्तान जो ये बात कर रहा है कि हमलों के लिए तालिबान को भारत मदद दे रहा है तो ये उसका पुराना शगल है पिछले साल अक्तूबर में भी उसने यही कहा था. मुंह उसका है, जो चाहे कहता रहे!

टॅग्स :पाकिस्तानतालिबान
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