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उनके करार से क्या हमें चिंता करनी चाहिए? 

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: September 20, 2025 07:34 IST

सऊदी अरब के तत्कालीन रक्षा मंत्री सुल्तान बिन अब्दुल अजीज अल साऊद न केवल पाकिस्तान गए थे बल्कि पाकिस्तान उन्हें परमाणु परीक्षण स्थल से लेकर परमाणु और मिसाइल ठिकानों पर भी ले गया था.

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पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सामरिक करार को लेकर इस वक्त बड़ी चर्चा हो रही है. यह सवाल पूछा जा रहा है कि सऊदी अरब के भारत से इतने अच्छे रिश्ते हैं तो फिर उसने पाकिस्तान से करार क्यों किया? करार के बाद दोनों देशों की ओर से कहा गया कि किसी भी आक्रामकता के खिलाफ वे मिलकर काम करेंगे. यदि किसी भी देश के खिलाफ कोई दूसरा देश आक्रामक रवैया अपनाता है तो उस आक्रामकता को दोनों देशों के खिलाफ माना जाएगा. इसे सीधी भाषा में इस तरह कह सकते हैं कि यदि दोनों में से किसी पर भी हमला होता है तो यह हमला दोनों पर माना जाएगा. पाकिस्तान और भारत के रिश्ते खराब हैं और दोनों के बीच कई जंग हो चुकी है.

अब यदि कोई जंग होती है तो फिर सऊदी अरब की भूमिका क्या होगी? इसका कोई स्पष्ट जवाब बड़ा मुश्किल है क्योंकि परिस्थितियां कब क्या होती हैं, किसे पता है. उदाहरण के लिए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने भले ही सीधे तौर पर पाकिस्तान का साथ नहीं दिया लेकिन परोक्ष रूप से तो साथ दिया ही? दरअसल पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच करार के इस पूरे प्रसंग को भारत के संदर्भ में कम और अमेरिका के संदर्भ में ज्यादा देखने की जरूरत है.

सुरक्षा के लिए सऊदी अरब पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहा है लेकिन हाल के दिनों में डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह से अमेरिका की विश्वसनीयता को संकट में डाला है, उसने सऊदी अरब जैसे देशों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उन्हें केवल अमेरिका के भरोसे नहीं रहना चाहिए. खासतौर पर दोहा पर इजराइल के हमले के बाद खाड़ी के देशों को ज्यादा चिंता हुई है. वे यह मान कर चल रहे हैं कि यदि कोई ऐसी स्थिति पैदा हुई कि इजराइल ने किसी और खाड़ी देश पर हमला कर दिया तो अमेरिका साथ नहीं देगा.

पहले सऊदी अरब और खाड़ी के कई देश यह मानकर चलते थे कि अमेरिका उनकी सुरक्षा की गारंटी देता है. मगर ट्रम्प के आने के बाद तो पूरा भरोसा ही चकनाचूर हो गया है. इसलिए न केवल सऊदी अरब बल्कि खाड़ी के दूसरे मुल्क भी विकल्प तलाश रहे हैं और उनकी नजर चीन, तुर्की और पाकिस्तान की तरफ रही है. चीन ने अमेरिकी के प्रति अविश्वास का पूरा फायदा उठाया है.

खाड़ी के देशों में उसने गहरी पैठ बना ली है. चीन को छोड़ दें तो तुर्की और पाकिस्तान दोनों ही मुस्लिम बहुल हैं इसलिए खाड़ी के देश उन दोनों देशोंं से जुड़ाव महसूस करते हैं तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. वैसे भी सऊदी अरब और पाकिस्तान का रिश्ता बहुत पुराना है. पाकिस्तान ने 1998 में जब परमाणु परीक्षण किया था तो सऊदी अरब के तत्कालीन रक्षा मंत्री सुल्तान बिन अब्दुल अजीज अल साऊद न केवल पाकिस्तान गए थे बल्कि पाकिस्तान उन्हें परमाणु परीक्षण स्थल से लेकर परमाणु और मिसाइल ठिकानों पर भी ले गया था. यह आश्चर्यजनक था क्योंकि आम तौर पर भी कोई भी देश किसी विदेशी को अपने परमाणु ठिकाने नहीं दिखाता है.

तब यह सवाल भी पैदा हुआ था कि क्या परमाणु परीक्षण के लिए धन मुहैया कराने में सऊदी अरब की कोई भूमिका थी? कोई स्पष्ट जवाब अब तक नहीं मिला. अभी जो करार हुआ है, उसका फायदा निश्चय ही पाकिस्तान को मिलेगा. सऊदी अरब के पास अकूत संपत्ति है और पाकिस्तान कंगाली की हालत में है तो रक्षा पर खर्च के लिए सऊदी अरब अपनी थैली खोल सकता है. वैसे भी पाकिस्तान की राजनीति में और काफी हद तक सेना में भी सऊदी अरब का हमेशा से ही हस्तक्षेप रहा है.

सऊदी अरब की यमन से लगी सीमा पर अभी भी पाकिस्तानी सैनिक मौजूद हैं. दोनों ही देश स्वाभाविक तौर पर साझेदार हमेशा से रहे हैं. इसके बावजूद सऊदी अरब ने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में रिश्तों को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है. भारत ने भी रिश्ते को परिपक्व बनाने की हर संभव कोशिश की है इसलिए इस एक करार के कारण सऊदी अरब को शंका की दृष्टि से बिल्कुल ही नहीं देखा जाना चाहिए. हर देश की अपनी कूटनीतिक जरूरतें होती हैैं. वह उसी के अनुरूप कदम उठाता है. इस करार को भी उसी नजरिये से देखा जाना चाहिए.

टॅग्स :पाकिस्तानसऊदी अरबभारत
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