Pakistan: The real shift will now start with Imran Khan's | असली पारी तो अब शुरू होगी इमरान खान की
असली पारी तो अब शुरू होगी इमरान खान की

करीब तेईस साल पहले जब इमरान खान राजनीति में प्रवेश के लिए कमर कस रहे थे, उस समय मैंने उनकी तैयारियों पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि ‘समस्या यह है कि क्रिकेट में मैच जिस जगह खत्म होता है, राजनीति में खेल वहां से शुरू होता है। इमरान को इस फर्क का एहसास है। इसीलिए वे कहते हैं कि चुनाव जीतना कोई बड़ी बात नहीं। लेकिन असली खेल तो उसके बाद शुरू होता है।’ आज इमरान से पूछा जाए तो वे मानेंगे कि उस समय उनकी पहली बात गलत साबित हुई। 

यानी चुनाव जीतना आसान साबित नहीं हुआ। पहले चुनाव में उनकी पार्टी के हाथों केवल सिफर लगा था। कुल मिलाकर उन्हें पूरे बाईस साल लग गए प्रधानमंत्री की कुर्सी के नजदीक पहुंचने में। अभी भी वे पूरी तरह से अपनी मंजिल पर नहीं हैं। उन्हें एक गठजोड़ की जरूरत होगी। साथ में यूरोपीय यूनियन के प्रेक्षक दल ने चुनाव-प्रक्रिया की वैधता पर जो सवाल लगा दिया है, उससे भी उन्हें निबटना होगा। प्रेक्षक दल की बातों ने पराजित विपक्ष को काफी बल प्रदान कर दिया है।

हां, उनकी दूसरी बात सही थी। असली खेल तो सत्ता हासिल करने के बाद शुरू होगा। 1996 में तहरीके-इंसाफ पार्टी की स्थापना से पहले उनके सामने छह सवाल थे। क्या वे पाकिस्तान को एक लोकतांत्रिक निजाम दे सकते हैं? क्या वे लोकतंत्र की संस्थागत अवधारणा में विश्वास रखते हैं? क्या उनके पास पाकिस्तान के जड़ीभूत आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने का रास्ता है? क्या वे चौतरफा भ्रष्टाचार के ऊपर कोई नैतिक संयम आरोपित कर सकते हैं? क्या वे पाकिस्तानी समाज को सामंती अवशेषों के चंगुल से निकाल कर एक प्रगतिकामी चरित्र प्रदान कर सकते हैं? क्या वे पाकिस्तान को अमेरिका का पिछलग्गू बने रहने की स्थिति से निकाल कर एक गौरवशाली आधुनिक राष्ट्र बना सकते हैं? क्या वे पाकिस्तान को भारत विरोधी युद्धोन्माद ने मुक्ति दिला कर उपमहाद्वीप को शांति और भाईचारे के रास्ते पर ले जा सकते हैं? दो दशक बाद आज भी इमरान खान के सामने यही छह सवाल हैं। अंतर यह है कि विपक्ष के नेता के रूप में वे पहले इन सवालों के जरिये अपने राजनीतिक विरोधियों पर वार करते थे। आज उन्हें स्वयं इन सवालों के जवाब देने हैं। इमरान के राजनीतिक करियर पर एक सिंहावलोकनात्मक निगाह डालने से कुछ-कुछ अंदाजा हो सकता है कि उनका आगे का रास्ता क्या होगा। लेकिन उससे पहले इमरान की एक अनूठी खूबी पर गौर कर लेना जरूरी है। 

यह खूबी है वक्त और जरूरत के साथ स्वयं को पूरी तरह से बदल डालने की क्षमता। क्रिकेट में अपनी शुरुआत करते समय इमरान खान एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज थे और कामचलाऊ मीडियम पेसर थे। लेकिन उनके चचाजात भाई और पाकिस्तानी टीम के प्रमुख बल्लेबाज माजिद खान ने उन्हें सलाह दी कि राष्ट्रीय टीम में एक से एक बड़े बल्लेबाज भरे पड़े हैं। दरअसल टीम को एक तेज गेंदबाज चाहिए। यह सलाह मान कर इमरान ने खुद को पूरी तरह से बदल डाला। उन्होंने कड़ी मशक्कत करके पहले अपनी देह तेज गेंदबाजी के अनुकूल बनाई और फिर गेंद फेंकते समय एक उछाल विकसित करके अपनी रफ्तार बढ़ाई। 

तेजी के साथ उन्होंने ¨स्वंग को जोड़ा और एक घातक गेंदबाज बन गए। इस तरह उन्हें टीम में न केवल प्रवेश मिला, बल्कि उन्होंने अपने उदाहरण से पाकिस्तान के युवकों को संदेश दिया कि क्रिकेटिंग हीरो केवल बल्लेबाज नहीं होता, बल्कि गेंदबाज भी होता है। इसके बाद तो पाकिस्तान की टीम में न सिर्फ तेज गेंदबाजों की लाइन लग गई, बल्कि इमरान ने खूबी के साथ बेहतरीन स्पिन गेंदबाजों को भी तैयार करके दिखाया। अच्छे बल्लेबाज तो इस टीम के पास पहले से ही थे। टीम की इस नई संरचना का लाभ इमरान को उस समय मिला जब उन्होंने इंग्लैंड को इंग्लैंड में, ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में और भारत को भारत में हरा कर अपना लक्ष्य पूरा किया। 

करियर के अंत में जीता गया विश्वकप उनके शानदार क्रिकेटिंग जीवन का अंतिम स्वíणम उपहार था जो उनकी बेहतरीन कप्तानी ने खुद को दिया था। इसी तरह जब वे राजनीति में आए तो अपने प्रमुख सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल हमीद गुल (पूर्व आईएसआई मुखिया) की राय से उन्होंने अपनी पश्चिमीकृत और अंग्रेजीदां शख्सियत को पूरी तरह से बदल डाला। ऑक्सब्रिज कनेक्शन के दम पर इंग्लैंड में अत्यंत लोकप्रिय इमरान खान नारीवादी चित्रकार एम्मा सार्जेट से प्रेम करते थे, लेकिन पाकिस्तान का नेता बनने के लिए उन्होंने पश्चिमी कपड़े छोड़े, उर्दू में भाषण देना शुरू किया, स्त्रियों को बच्चों के लालन-पालन में ध्यान लगाने का उपदेश दिया और अनुदारपंथी के रूप में उभरे। 

चुनावों में शुरुआती नाकामियों के बीच इमरान को कामयाबी का पहला स्वाद 2013 में मिला जब उनकी पार्टी को खैबर-पख्तूनख्वा में गठजोड़ सरकार का नेतृत्व करने का मौका मिला। यह प्रांत अपने सामरिक महत्व के लिए जाना जाता है। हालांकि इमरान पहले से ही फौज और आईएसआई के नजदीक थे, पर इस प्रांत पर हुकूमत के जरिए वे इस मुल्क के फौजी निजाम के पसंदीदा नेता बन गए। इसके बाद उन्होंने सेना के साथ एक भीतरी समझौता करके नवाज शरीफ के मुंह पर भ्रष्टाचार की कालिख पोतने के जरिए उन्हें ठिकाने लगाने की योजना पर अमल शुरू किया। अदालत ने भी सेना का साथ दिया और देखते-देखते नवाज शरीफ के लिए पाकिस्तान में राजनीति करना तकरीबन नामुमकिन हो गया। इस योजना की सफलता का नतीजा ही इमरान के सत्ता के नजदीक पहुंचने में देखा जा सकता है। 

 इसमें कोई शक नहीं कि भारत को इमरान की राजनीति के अनुदार पहलुओं और पाकिस्तानी फौज के भारत विरोधी रवैये पर कड़ी निगाह रखनी होगी, लेकिन इसी के साथ-साथ हमें यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं करना होगा कि इस चुनाव में इमरान को मिली कामयाबी के पीछे हाफिज सईद और फजलुर्रहमान जैसे कट्टर तत्वों को मिली नाकामी है। इन लोगों ने राजनीतिक दल बना कर चुनाव में भाग लिया था। इन्हें कड़ी पराजय हाथ लगी है, और फजलुर्रहमान तो अपने घरेलू इलाके डेरा इस्माइल खान में दोनों सीटों पर चुनाव हार गए हैं। इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि फौज ने सईद और रहमान की जगह इमरान को प्रधानमंत्री बनाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। 

अब इमरान की असली पारी शुरू होगी। गेंदबाजी भी वे करेंगे और बल्लेबाजी भी वे ही करेंगे। यहां तक कि फीलिं्डंग भी उन्हें ही करनी पड़ेगी। उनका मुख्य वायदा भ्रष्टाचार मिटाने का है। दिल्ली के एक पत्रकार ने उनका वक्तव्य सुन कर व्यंग्य से कहा है कि वे पाकिस्तान के मोदी+केजरीवाल के रूप में उभरे हैं। जो भी हो, उनकी पहली असली चुनौती यह होगी कि वे अपनी समर्थक फौज द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार से कैसे निबटते हैं (अगर यह मान लिया जाए कि वे नेताओं के भ्रष्टाचार से आसानी से निबट लेंगे)। क्योंकि, फौज की तरफ उंगली उठाने का मतलब उस दोस्त को दुश्मन बनाना होगा जिसने उन्हें गद्दी पर बिठाया है। 


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