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भारत की संप्रभुता का सम्मान करे पाकिस्तान

By शोभना जैन | Updated: August 11, 2019 05:20 IST

अर्से से कश्मीर में सीमापार आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाकिस्तान, मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म किए जाने से बौखला कर हताशा में एक के बाद एक ऐसे कदम उठा रहा है

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अर्से से कश्मीर में सीमापार आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाकिस्तान, मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म किए जाने से बौखला कर हताशा में एक के बाद एक ऐसे कदम उठा रहा है, जो भारत-पाक संबंधों के लिए ही नहीं बल्कि उसके लिए भी कतई हितकारी नहीं है. भारत की संप्रभुता का सम्मान करने की बजाय पाकिस्तान ने भारत के इस फैसले के बाद उसके साथ राजनयिक स्तर में कटौती करने सहित अन्य ऐसे ही कदम उठाकर दुनिया के सामने द्विपक्षीय संबंधों की चिंताजनक तस्वीर पेश करने का प्रयास भले ही किया हो.

राजनैतिक हताशा, आर्थिक बदहाली और तमाम घरेलू दबावों के चलते नतीजों की परवाह किए बिना ऐसे कदम उठना और खास तौर पर इस मामले का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना उसकी मजबूरी तो है. वह जानता है कि व्यापार बंद करने जैसे कदम उठाकर वह भारत का कोई खास नुकसान नहीं कर रहा है. समझौता एक्सप्रेस बंद करके, एयर स्पेस को आंशिक रूप से बंद कर के क्या वह दोनों देशों में खून के रिश्तों से बंधे रिश्तेदारों के मिलने पर रोक लगा कर अमानवीय काम नहीं कर रहा है? सांस्कृतिक आदान-प्रदान बंद करके क्या वह जनता को एक दूसरे से दूर नहीं कर रहा है? 

दरअसल पाकिस्तान इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जा सकता है, जैसा कि वह कह रहा है, इस्लामी संगठन देशों ओआईसी से वह समर्थन जुटाने की कोशिश करेगा लेकिन निश्चय ही भारत अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक मजबूत स्थिति में है, अपने संप्रभुता से जु्ड़े मुद्दे पर राजनयिक रूप से अपना पक्ष अच्छी तरह से रख पाएगा,और वैसे भी आतंक को प्रश्रय दिए जाने को लेकर पाकिस्तान की असलियत से दुनिया अब वाकिफ हो चुकी है. आतंक से निबटने के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं किए जाने की वजह से अंतर्राष्ट्रीय मदद रोकने की एफएटीएफ की तलवार उस पर पहले से ही लटक रही है. विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर कल से शुरू होने वाली चीन के पूर्व निर्धारित दौरे की पृष्ठभूमि में देखे तो खबर है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह मोहम्मद कसूरी भी चीन पहुंच गए हैं.

लेकिन सवाल वही है कि कश्मीर के बारे में यह फैसला भारत के संघीय ढांचे के तहत ही लिया गया, अहम बात यह है कि अनुच्छेद 370 कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के किसी प्रस्ताव के तहत नहीं आता है. यह धारा संयुक्त राष्ट्र के जम्मू-कश्मीर के किसी भी प्रस्ताव के बरसों बाद 1954 में भारतीय संविधान में शामिल की गई, भारत अपनी संप्रभुता से जुड़ी किसी भी धारा को हटा सकता है. अच्छा है कि पाकिस्तान यह हकीकत समझे, सीमापार आतंकी गतिविधियां विशेष तौर पर जम्मू-कश्मीर में फौरन बंद करे और भारत-पाक संबंधों को इस पड़ाव पर लाने के अपने फैसलों पर पुन: विचार करे. वैसे उसने इन अपरिपक्व फैसलों से हट कर करतारपुर गलियारे परियोजना में पूर्ववत आगे बढ़ने जैसा समझदारी पूर्ण कदम उठाया है.

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