लाइव न्यूज़ :

बरसों तक संविधान और लोकतंत्र से दूर रहा पाकिस्तान

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: July 16, 2018 06:52 IST

संविधान सभा के अथक प्रयासों से हिंदुस्तान तो छब्बीस जनवरी, उन्नीस सौ पचास को अपना संविधान लागू कर चुका था।  प्रधानमंत्री पंडित नेहरु और राष्ट्रपति डॉ। राजेंद्र प्रसाद ने चुनाव आयोग के गठन और पहले आम चुनाव तक जिम्मेदारी संभाली थी। उन्नीस सौ बावन में हिंदुस्तान में लोकतंत्र ने अपना सफर बाकायदा शुरू कर दिया, लेकिन पाकिस्तान में सत्ता की बंदरबांट चलती रही। तब तक फौज की दाढ़ में सियासत का खून नहीं लगा था। 

Open in App

लेखक- राजेश बादल

संविधान सभा के अथक प्रयासों से हिंदुस्तान तो छब्बीस जनवरी, उन्नीस सौ पचास को अपना संविधान लागू कर चुका था।  प्रधानमंत्री पंडित नेहरु और राष्ट्रपति डॉ। राजेंद्र प्रसाद ने चुनाव आयोग के गठन और पहले आम चुनाव तक जिम्मेदारी संभाली थी। उन्नीस सौ बावन में हिंदुस्तान में लोकतंत्र ने अपना सफर बाकायदा शुरू कर दिया, लेकिन पाकिस्तान में सत्ता की बंदरबांट चलती रही। तब तक फौज की दाढ़ में सियासत का खून नहीं लगा था। कम लोग यह जानते हैं कि भारत में तो आजादी के बाद सी। राजगोपालाचारी थोड़े समय के लिए ही गवर्नर जनरल थे और तुरंत बाद राष्ट्रपति बने। लेकिन पाकिस्तान में उन्नीस सौ छप्पन तक गवर्नर जनरल राज चला। चूंकि संविधान सभा ने पाकिस्तान का संविधान नहीं बनाया था इसलिए गवर्नर जनरल एक तरह से उन्नीस सौ छप्पन तक ब्रिटेन के शाही परिवार के अधीन माना गया था।मोहम्मद अली जिन्ना के बाद ख्वाजा निजामुद्दीन, मालिक गुलाम और इसकंदर मिर्जा गवर्नर जनरल बने। जिन्ना ने करनाल राजघराने से गए लियाकत अली खान को प्रधानमंत्री बनाया था। वो उन्नीस सौ इक्यावन तक इस पद पर रहे। उनके बाद ख्वाजा निजामुद्दीन, मोहम्मद अली बोगरा और मोहम्मद अली प्रधानमंत्री पद पर डटे रहे। किसी ने संविधान लागू कराने और चुनाव की ज़रूरत ही नहीं समझी। आज़ादी के पहले 1946 में हुए चुनाव वाली विधानसभाएं ही काम करती रहीं। उन्होंने भी मुल्क में निर्वाचन के लिए कोई दबाव नहीं बनाया। एक दशक यह सिलिसला चलता रहा। गौरतलब यह है कि पाकिस्तान में दस साल वो लोग नेतृत्व करते रहे,जो गुलाम भारत में अंग्रेजों के पिट्ठू थे अर्थात उनकी सेवाओं में मलाईदार ओहदों पर थे। अलबत्ता पाकिस्तान की अवाम इस समय तक भी ठीक-ठाक हाल में थी और देश में हिंदुस्तान से नफरत का स्वर बहुत तीखा नहीं था। गड़बड़ी की शुरु आत हुई इसकंदर मिर्जा के जमाने में। गवर्नर जनरल बनने से पहले मिर्जा प्रधानमंत्री लियाकतअली खान के भरोसेमंद थे। इसीलिए उन्हें पहला रक्षा सचिव बनाया गया था।राजनीति में सेना का प्रभाव इसी कालखंड में बढ़ा। सेना अध्यक्ष जनरल अयूब खान को मिर्जा ने पाकिस्तान का पहला कमांडर इन चीफ बनाया था। उन्हें मुख्य सैनिक प्रशासक नियुक्त किया गया। लेकिन बीस दिन ही बीते थे कि जनरल अयूब खान ने मिर्जा को सैनिक विद्रोह के ज़रिए हटा दिया। मिर्जा दगाबाजी से सन्न रह गए। जनरल अयूब ने इतनी राहत दी कि उन्हें जेल में नहीं डाला,बल्कि देश से बाहर निकाल दिया। निर्वासन के दौरान मिर्जा की लंदन में मौत हो गई। उन्हें ईरान में दफनाया गया। बताना जरूरी है कि इसकंदर मिर्जा मीरजाफर के प्रपौत्र थे। जनरल अयूब खान 11 साल पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे। उन्होंने हुकूमत को स्थिरता तो दी, लेकिन फौजी बैसाखियों के सहारे, पाकिस्तान अमेरिका की गोद में बैठा, मुल्क में आईएसआई का दबदबा बढ़ा। लड़ी और ताशकंद में लालबहादुर शास्त्री से समझौते के कारण सुर्खियां बटोरी। पाक ने जन्म के 11 साल बाद देखी फौजी हुकूमतमुंबई में पढ़े लिखे मिर्जा गोरी फौज में भी सेवाएं दे चुके थे। 1956 में पाकिस्तान का संविधान लागू हुआ और गवर्नर जनरल की जगह राष्ट्रपति सर्वेसर्वा माना गया। चुनाव आयोग ने काम शुरू किया। मिर्जा पहले राष्ट्रपति बन बैठे। इसके बाद भी चुनाव नदारद थे। दो साल के दौरान मिर्जा ने चार प्रधानमंत्री बदले। बार-बार के बदलावों ने मिर्जा की छवि  खराब कर दी। आखिरकार मिर्जा ने संविधान निलंबित कर सैनिक शासन लगा दिया। पाकिस्तान ने जन्म के 11 साल बाद फौजी हुकूमत पहली बार देखी।

भुट्टो का राजनीति में उदयइन दिनों घनघोर मार्क्‍सवादी ज़ुल्फिकार अली भुट्टो का राजनीति में उदय हुआ। भुट्टो हिंसा के बल पर सत्ता बदलना चाहते थे और चीन से पींगें बढ़ा रहे थे। शेख मुजीबुर्रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान में भाषा और व्यापक राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए पूर्वी बंगाल में आंदोलन छेड़ा तो अयूब ने उन्हें भारत से मिलकर अलग देश बनाने के आरोप में जेल मे डाल दिया। दूसरी ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला हुआ। उनका बेटा गौहर अयूब कमीशनखोरी और रिश्वत लेने के मामले में बदनाम हुआ। उन्नीस सौ पैंसठ में जिन्ना की बहन को राष्ट्रपति के चुनाव में अयूब ने हराया लेकिन उनकी बड़ी बदनामी हुई। चुनाव में धांधली के आरोप लगे। अयूब इतने अलोकप्रिय हो गए कि एक जन आंदोलन उनके खिलाफ खड़ा हो गया।

टॅग्स :पाकिस्ताननवाज शरीफमरियम नवाज
Open in App

संबंधित खबरें

विश्वकर्ज़ में डूबे पाकिस्तान के लिए भारी मुसीबत, यूएई ने इसी महीने 3.5 अरब डॉलर का लोन चुकाने को कहा

ज़रा हटकेपाकिस्तान की 80% आबादी समलैंगिक और 20% उभयलिंगी?, ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता हिना बलोच का बयान, वायरल वीडियो

कारोबारपाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत 458.40, केरोसिन दाम 457.80 और डीजल की कीमत 520.35 रुपये प्रति लीटर?

भारतफील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ: पाक पर 1971 की महाविजय के नायक

विश्वपाकिस्तान में जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर के भाई की मौत, मृत्यु के कारणों पर सस्पेंस बरकरार

विश्व अधिक खबरें

विश्ववैज्ञानिकों ने हमारे सौरमंडल के बाहर 45 पृथ्वी जैसे ग्रहों को खोज निकाला

विश्वअसल समस्या ट्रम्प हैं या दुनिया का दरोगा बनने की अमेरिकी मनोदशा?

विश्वअबू धाबी में रोकी गई ईरानी मिसाइलों के मलबे की चपेट में आने से घायल 12 लोगों में 5 भारतीय शामिल

विश्व2027 में रिटायरमेंट और 2026 में जबरन हटाया?, सेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज पर गाज?, ईरान युद्ध के बीच अमेरिकी रक्षा में हलचल

विश्वअमेरिका-इजरायल के वार बेअसर? हमलों के बावजूद ईरान की मिसाइल क्षमता बरकरार: रिपोर्ट