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मादुरो और सद्दाम होने के लिए हिम्मत चाहिए!

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 7, 2026 07:30 IST

दुनिया के तमाम सभ्य देशों को अमेरिका की मुखालफत करनी चाहिए.

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सद्दाम हुसैन के बारे में एक कहानी प्रचलित है कि पक्की सूचना के आधार पर अमेरिकी सैनिक जब उस जगह पहुंचे जहां एक गड्ढे में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन छिपे थे तो सैनिकों ने आवाज लगाई कि अंदर कौन है? सद्दाम ने अंदर से आवाज दी कि मैं सद्दाम हुसैन, इराक का राष्ट्रपति! वे सहजता से बाहर आए, उन्होंने कोई विरोध नहीं किया न खुद को गोली मारी जबकि उनके पास एक रिवाल्वर मौजूद था. बहुत से लोगों ने तब सोचा होगा कि अमेरिकी प्रताड़ना झेलने से ज्यादा बेहतर तो यह था कि सद्दाम खुद को गोली मार लेते!

अब अमेरिका द्वारा बंदी बनाए गए वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की कहानी पर गौर कीजिए! क्या उन्हें अंदाजा नहीं रहा होगा कि अमेरिका के खिलाफ उन्होंने जो तेवर अपना रखे थे, उसका क्या परिणाम हो सकता है? उन्होंने तो डोनाल्ड ट्रम्प को चुनौती देते हुए कहा था कि कायरों, हिम्मत है तो आकर मुझे पकड़ो! हो सकता है कि उन्हें इस बात का अंदाजा न रहा हो कि इस तरह उनका अपहरण कर लिया जाएगा, लेकिन इतना तो अंदाजा होगा ही कि ट्रम्प नियम-कानूनों को तोड़ने वाले व्यक्ति हैं और वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं.

ऐसी स्थिति में अपहरण से बचने के लिए वे कोई न कोई जतन कर सकते थे. मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. अपहरण के बाद जब न्यूयॉर्क सिटी की एक अदालत में उन्हें ले जाया गया तो जज ने उनके पहचान की पुष्टि के लिए जब सवाल किए तो मादुरो ने पूरे गर्व के साथ कहा कि हां, वे निकोलस मादुरो हैं और उन्हें अगवा करके यहां लाया गया है. दोनों ही, सद्दाम और मादुरो के मामले में एक समानता है कि दोनों को ही अमेरिका ने पकड़ लिया लेकिन उनके हौसले को नहीं तोड़ पाया.

सद्दाम ने तो अमेरिकी अदालत के सामने अमेरिका के नंगेपन का बखान किया और मान कर चलिए कि मादुरो भी यही करने वाले हैं. हो सकता है कि सद्दाम की तरह मादुरो का अंजाम भी मौत पर जाकर रुके लेकिन दोनों ने साबित किया है कि अमेरिका कितना भी बड़ा दादा हो, वो सद्दाम हुसैन या मादुरो जैसे हिम्मतियों की हिम्मत नहीं तोड़ सकता. आज पूरी दुनिया जानती है कि जिस सद्दाम हुसैन को रासायनिक हथियार रखने के नाम पर पकड़ा गया और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई, उस शख्स के देश इराक में एक रासायनिक हथियार भी नहीं मिला.

अब मादुरो को अदालत में यह साबित करना है कि वे ड्रग्स की तस्करी में शामिल नहीं थे, न अमेरिका में अवैध हथियार भेज रहे थे. यह साबित करना उनके लिए आसान नहीं होगा क्योंकि अमेरिका तो आरोपों की लंबी फेहरिस्त अदालत में पेश कर देगा और उसकी खुफिया एजेंसी न जाने कहां कहां से क्या-क्या डॉक्युमेंट्स जुटा लेगी. यानी तय है कि या तो वे जेल में सड़ जाएंगे या फिर फांसी के फंदे पर लटका दिए जाएंगे. लेकिन ऐसे लोगों को मौत का भय नहीं सताता. वे एक विचार के साथ जीते हैं.

मादुरो का हश्र चाहे जो हो लेकिन एक बात तय है कि उन्होंने अमेरिका को अपहरणकर्ता तो साबित कर ही दिया है. उन्होंने दुनिया के सभी देशों को और खासकर छोटे देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अमेरिका की दादागीरी का कोई जवाब नहीं है? जो भी उसके हुक्म को नहीं मानेगा, उस पर हमला कर देगा? और अमेरिका की इस हरकत ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र को नाकारा और अमेरिका की कठपुतली साबित कर दिया है. दुनिया के तमाम सभ्य देशों को अमेरिका की मुखालफत करनी चाहिए.

अमेरिका कितना भी बलशाली हो, यदि दुनिया के सारे देश उसके खिलाफ खड़े हो जाएं तो उसे घुटनों पर लाया जा सकता है. किसी जमाने में ब्रिटेन इतना ताकतवर था कि उसने 56 देशों को गुलाम बना रखा था. वह दुनिया के 23 प्रतिशत भूभाग का मालिक बन बैठा था लेकिन आज उसकी हालत क्या है? इस वक्त अमेरिका भी धन और शक्ति के अहंकार में है. अहंकार किसी का नहीं टिकता! अमेरिका का भी नहीं टिकेगा. बात केवल वक्त की है.

टॅग्स :Caracasडोनाल्ड ट्रंपसद्दाम हुसैनSaddam Hussein
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