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भुट्टो के मामले में पाकिस्तानी अदालत के घड़ियाली आंसू

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 8, 2024 10:50 IST

आखिरकार पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने 45 साल बाद मान ही लिया कि पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी की सजा देने के दौरान निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई थी।

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ठळक मुद्देपाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जुल्फिकार अली भुट्टो को दी गई फांसी में ट्रायल सही नहीं हुआ थाकोर्ट ने कहा कि 1979 में सात जजों की पीठ ने सुनवाई के दौरान सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया थासाल 1977 में सैन्य तानाशाह जिया उल हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दे दिया था

आखिरकार पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने 45 साल बाद मान ही लिया कि पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी की सजा देने के दौरान निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपनी सुनवाई के दौरान माना कि साल 1979 में सात जजों की पीठ ने अपनी सुनवाई के दौरान सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया था।

उल्लेखनीय है कि साल 1977 में सैन्य तानाशाह जिया उल हक ने भुट्टो की सरकार को हटाकर पाकिस्तान पर कब्जा कर लिया था और उन्हीं के राज में पूर्व प्रधानमंत्री भुट्टो को फांसी की सजा दे दी गई थी।

पाकिस्तान की जनता का यह दुर्भाग्य रहा है कि 1947 में पाकिस्तान के जन्म के बाद से अधिकांश समय उसे सैन्य तानाशाहों के चंगुल में ही रहना पड़ा है। जब कभी चुनाव हुए भी तो सिर्फ दिखावे के लिए हुए और कथित लोकतांत्रिक सरकारें भी सेना की उंगलियों पर ही नाचती रहीं।

विडंबना यह है कि वहां की अदालतों ने भी लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिशें नहीं कीं और सैन्य तानाशाहों के दबाव में ही काम करती रहीं, जिसका ज्वलंत उदाहरण जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी देना था।

अब हालांकि वहां की सर्वोच्च अदालत ने माना है कि भुट्टो के साथ अदालत द्वारा अन्याय हुआ था लेकिन कितनी बड़ी त्रासदी है कि इमरान खान के साथ हो रहे अन्याय के ताजा मामले में वही अदालत आंखें मूदे हुए है! इमरान खान को भी प्रधानमंत्री हालांकि वहां की सेना ने ही बनाया था लेकिन जब उन्होंने उसकी कठपुतली बने रहने से इंकार कर दिया तो वह उनकी खिलाफत पर उतर आई।

सब जानते हैं कि हालिया आम चुनाव में इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के चुनाव लड़ने पर चुनाव आयोग द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद उनकी पार्टी द्वारा खड़े किए गए निर्दलीय उम्मीदवार सर्वाधिक संख्या में चुने गए हैं और अगर सेना ने धांधली करके शरीफ की पार्टी को जितवाने की कोशिश न की होती तो पीटीआई द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवार भारी बहुमत से सत्ता में आते!

क्या तीस-चालीस साल बाद यही अदालत अपने ऊपर लगे दाग को मिटाने की कोशिश करते हुए कहेगी कि इमरान खान के साथ अन्याय हुआ था? अतीत की गलतियों को स्वीकारने का तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक कि उससे सीख लेते हुए वर्तमान के अन्याय को दूर करने की कोशिश न की जाए।

पाकिस्तान हमेशा अपने पड़ोसी देश भारत के खिलाफ जहर उगलता रहता है लेकिन काश! कभी वह हमारे लोकतंत्र और न्यायपालिका से सीख लेने की कोशिश भी करता तो आज उसे बदहाली के ये दिन न देखने पड़ते।

टॅग्स :पाकिस्तानPakistan ArmyIslamabad
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