किरण चोपड़ा
किसी भी मां का बेटा खो जाना शब्दों से परे दर्द है. यह केवल एक घटना नहीं बल्कि उस मां का सारा संसार उजड़ जाता है. हम नहीं जानते कि दिल्ली के द्वारका के साहिल की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत को लेकर कहां गलती है, यह सब पुलिस और न्यायालय का काम है परंतु इस समय सारे समाज की भावनाएं उस मां के साथ जुड़ी हैं. एक मां का इकलौता बेटा छिन गया. हम सब उस मां के लिए न्याय चाहते हैं लेकिन कानून के दायरे में हम सब सच्चाई चाहते हैं, बिना अफवाह के और हम साथ ही साथ ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जहां कोई मां अपने बेटे को यूं न खोए.
यह एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए सोचने और आत्ममंथन का विषय है लेकिन साथ ही हमें याद रखना होगा कि न्याय भावनाओं से नहीं तथ्यों और कानून से होता है. हम किसी को बिना जांच दोषी नहीं ठहरा सकते, हम सोशल मीडिया को अदालत नहीं मान सकते.
साथ ही हमें यह घटना और उस मां का दर्द यह सोचने पर मजबूत करता है कि क्या हमारे युवाओं को सही मार्गदर्शन, मानसिक सहारा और सुरक्षित वातावरण मिल रहा है. क्या हम अपने बच्चों का खासकर नाबालिगों का ध्यान रख रहे हैं. क्या एक नाबालिग बिना लाइसेंस के गाड़ी चला सकता है, क्या कोई रील बनाने के चक्कर में किसी की जिंदगी से खेल सकता है.
मैं फिर कहूंगी कि यह सब पुलिस और न्यायपालिका को ही देखना है. कुछ दिन पहले नोएडा में एक पढ़ा-लिखा बेटा चार घंटे तक जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ते-लड़ते हार गया. लोग वहां खड़े देखते रहे. ऐसे ही दिल्ली में एक बेटा खोदे हुए गड्ढे में गिरकर जान गंवा बैठा. सड़क हादसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं.
एक बेटे की मौत केवल मौत नहीं, बल्कि परिवार के सपने और सहारा छिनने की बात है लेकिन सड़क पर हादसों के दौरान किसी के नहर में गिरने के दौरान वीडियो बनाने और रील बनाने के लिए सब सक्रिय रहते हैं. ऐसा लगता है कि तड़पते या किसी डूबते को बचाने की बात कोई सोचता ही नहीं!
मेरा दिल करता है उस मां से मिलूं और उसको अपने सीने से लगा उसके सारे आंसू पी जाऊं क्योंकि मैं भी मां हूं. बच्चे को चोट लग जाए, बुखार आ जाए तब कितनी बेचैनी होती है और एक मां ने अपने बच्चे को खून से लथपथ सड़क पर पड़े देखा और खो दिया. उस मां का दर्द कोई कम नहीं कर सकता. हे ईश्वर! उसको सब्र दो, शक्ति दो जो बहुत मुश्किल है.