जावेद आलम
रमजान, रोजे, सहरी, इफ्तार, शबे-कद्र व ऐतिकाफ के अपने रहमतों व बरकतों भरे परंपरागत पड़ाव तय करती, ईद-उल-फितर की सालाना खुशियों ने एक बार फिर मोमिनीन के दरों पर दस्तक दे दी. पूरे महीने की रियाजत का इनाम लेने पूरे संसार के मुसलमान, ईद की विशेष दो रकअत नमाज के जरिये, सच्चे दाता अल्लाह रब्बुलइज़्ज़त के दर पर शुक्राना अदा करने पहुंचेंगे. उसके सामने अपनी दिली मुरादें पूरी करने की इल्तिजा रखेंगे. उसका वादा है कि सच्चे दिल से की गई इबादत के बदले तुम्हें बख्शीश (मोक्ष) का परवाना मिलेगा. इस नमाज से पहले सदका-ए-फित्र अदा कर दिया जाता है.
यह सदका-ए-फित्र, जिसकी वजह से इसे ईद-उल-फितर कहा जाता है, हर खाते-पीते मुसलमान को अदा करना जरूरी है. यह समाज के वंचित, कमजोर तबकों (वर्गों) को दिया जाता है, जिससे वे भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें. त्याग व तपस्या वाले पाक महीने रमजान के रोजे व दीगर इबादतों में कोई कमी-बेशी रह गई हो,
कोई भूलचूक हो गई हो तो सदका-ए-फित्र के जरिये उस मैल को धोने का इंतजाम किया गया है. ऐसा हुक्म है कि सदका-ए-फित्र की रकम ईद की नमाज से पहले जरूरतमंदों तक पहुंचा दी जाए. रोजेदारों की इबादतों को पाक करने के साथ इसका दुनियावी फायदा यह है कि गरीब व कमजोर वर्ग के भी त्यौहार मनाने का इंतजाम हो जाए.
वैसे ईद सिर्फ अच्छे-अच्छे लजीज खानों से पेट भरने, रंग-बिरंगे, कीमती लिबास पहनने व तरह-तरह की सहूलियतें जमा करने का नाम नहीं है. इसकी असल रूह अल्लाह की बंदगी, उसे राजी करना व उसी से मांगना, आपसी भाईचारा, मेल-मिलाप बढ़ाना तथा छोटे-बड़े, अमीर-गरीब का भेदभाव मिटाना है. इसीलिए खुद को रूहानी तौर पर पवित्र कर के, कोई कोर-कसर रह गई हो तो सदका-ए-फित्र अदा कर के, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब सबको साथ लेते हुए रब से इनाम हासिल करने का दिन है ईद-उल-फितर.