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महिला सुरक्षा रिपोर्ट सूचकांकः महिलाओं की असुरक्षा से हमारी सभ्यता पर लगता प्रश्नचिह्न

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: August 30, 2025 05:27 IST

Women Safety Report Index: मुंबई महानगर भी इस मामले में खुद पर गर्व कर सकता है कि महिलाएं वहां खुद को असुरक्षित महसूस नहीं करतीं.

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ठळक मुद्देचौबीसों घंटे चहल-पहल रहती है या कह सकते हैं कि रात होती ही नहीं. शैक्षणिक संस्थानों को सुरक्षित मानती हैं लेकिन रात में असुरक्षा महसूस करती हैं.हर तीन में से दो महिलाएं उत्पीड़न की शिकायत ही दर्ज नहीं करातीं!

Women Safety Report Index: राष्ट्रीय वार्षिक महिला सुरक्षा रिपोर्ट एवं सूचकांक (एनआरआई) 2025 की ताजा रिपोर्ट में यह खुलासा स्तब्ध कर देने वाला है कि देश के पटना, जयपुर, कोलकाता जैसे शहर महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं हैं. यहां तक कि हमारे देश की राजधानी दिल्ली भी महिलाओं के लिए असुरक्षित है! जबकि कोहिमा, आइजोल, गंगटोक, ईटानगर जैसे पूर्वोत्तर के शहर, जो कि अपेक्षाकृत दुर्गम क्षेत्र माने जाते हैं, वहां महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं. मुंबई महानगर भी इस मामले में खुद पर गर्व कर सकता है कि महिलाएं वहां खुद को असुरक्षित महसूस नहीं करतीं.

इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वहां चौबीसों घंटे चहल-पहल रहती है या कह सकते हैं कि रात होती ही नहीं. यह संभावना इसलिए भी बलवती लगती है कि सर्वेक्षण के अनुसार 86 प्रतिशत महिलाएं दिन में शैक्षणिक संस्थानों को सुरक्षित मानती हैं लेकिन रात में असुरक्षा महसूस करती हैं.

सर्वेक्षण से एक स्तब्ध कर देने वाली बात यह सामने आई है कि हर तीन में से दो महिलाएं उत्पीड़न की शिकायत ही दर्ज नहीं करातीं! इसके कारण राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) तक वास्तविक घटनाओं का बड़ा हिस्सा दर्ज ही नहीं हो पाता. इसका मतलब है कि महिला उत्पीड़न की जितनी घटनाओं के बारे में हम जानते हैं वह आइसबर्ग की तरह है, जिसका जितना हिस्सा दिखाई देता है,

उससे कई गुना ज्यादा पानी में डूबा होता है. सचमुच ही यह हमारे मानव समाज के लिए बेहद शर्मनाक है कि दिल्ली सहित बड़े-बड़े शहरों में भी महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं, और कई जगह जहां दिन में सुरक्षित महसूस करती हैं, वहां रात में नहीं करतीं! मानव जाति को तो दुनिया में सबसे सभ्य माना जाता है,

फिर भी दिन में शालीन नजर आने वाले पुरुष वर्ग के भीतर का जानवर रात में क्या इतना हावी हो जाता है कि महिलाओं को उनसे डर लगने लगे? क्या पुरुष सिर्फ कानून-व्यवस्था के डर से ही सभ्यता का नकाब ओढ़े रहते हैं और मौका पाते ही अपने भीतर के जानवर को छूट देने से नहीं चूकते? रिपोर्ट में कहा गया है कि औसतन चालीस फीसदी महिलाएं शहरों में खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं.

कहने को हम कह सकते हैं कि साठ फीसदी महिलाएं अपने शहर में खुद को सुरक्षित मानती हैं, लेकिन एक सभ्य समाज उसी को कहा जा सकता है जिसमें कोई भी अपने आप को असुरक्षित न माने. इसलिए चालीस फीसदी का आंकड़ा समाज के पुरुष वर्ग की सभ्यता पर सवाल तो उठाता ही है. अब समय आ गया है कि सारी महिलाएं अपने ऊपर होने वाले उत्पीड़न को खुलकर सामने लाएं, क्योंकि घाव को अगर छुपाकर रखा जाए तो वह सड़ने लगता है. उसे ठीक करने के लिए उसमें नश्तर तो लगाना ही होगा! 

टॅग्स :नारी सुरक्षावुमन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट मिनिस्ट्री
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