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शशिधर खान का ब्लॉगः अल्पसंख्यक दर्जे की परिभाषा का जटिल है सवाल

By शशिधर खान | Updated: April 5, 2022 15:36 IST

केंद्र के हलफनामे के अनुसार राज्यों का तो बाद में, पहले अब तय हो जाए कि एनसीएम (राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग) एक्ट के अंतर्गत केंद्र को प्राप्त आधिकार संवैधानिक रूप से वैध है या नहीं।

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सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के जवाब में केंद्र सरकार को स्पष्ट करना है कि राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की परिभाषा तय करने का आधार क्या है और उन राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है या नहीं, जहां उनकी संख्या अन्य समुदायों से कम हो गई है। इस महीने के अंतिम सप्ताह तक केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे की स्थिति स्पष्ट करके बताना है कि अन्य समुदायों की तुलना में कम संख्या वाले राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है या नहीं। केंद्र सरकार को यह भी स्पष्ट करना है कि किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का आधार क्या है।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर करनेवाले वकील अश्विनी उपाध्याय भाजपा के हैं और केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में चल रही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार हिंदुत्व एजेंडे की ही सियासी राजनीति करती है। कम हिंदू आबादी वाले राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के संबंध में दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बावजूद यह सरकार चुप रही। इस पर कोई स्टैंड लेना तो दूर, नोटिस का जवाब भी सरकार टालती रही। जबकि याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी अर्जी में कश्मीर, पंजाब और कई उत्तर पूर्वी राज्यों का हवाला दिया, जहां बहुसंख्यक समुदायों के लोग अल्पसंख्यक दर्जे के अधिकारों का लाभ उठा रहे हैं। इन राज्यों के हिंदू अल्पसंख्यक होने के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर बहुसंख्यक समुदाय धारणा के कारण सामाजिक और आर्थिक रूप से अल्पसंख्यक दर्जे के अधिकार से वंचित हैं। क्योंकि संविधान में ही अल्पसंख्यक दर्जे की कोई ठोस परिभाषा तय नहीं है।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब तब दिया, जब पांच साल से लंबित इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रवैया अपनाया और केंद्र सरकार को फटकार के साथ दूसरी बार हलफनामे के लिए चार हफ्ते की डेडलाइन दी। विगत 27 मार्च को केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट पीठ को हलफनामा दायर कर बताया कि ‘राज्य सरकारें भी अल्पसंख्यक दर्जे की परिभाषा तय कर सकती हैं और अपने यहां किसी धार्मिक या भाषाई समुदाय को ‘अल्पसंख्यक समुदाय’ घोषित कर सकती हैं।’ केंद्र सरकार ने 7500 रु. का जुर्माना भी भरा, जो शीष कोर्ट ने नोटिस की अवहेलना के लिए लगाया।

पंजाब, कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में तो हिंदू अल्पसंख्यक हैं ही, याचिकाकर्ता ने 2011 की जनगणना के आधार पर इसकी पुष्टि आंकड़ों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में की है। 2011 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं के अल्पसंख्यक होने का राज्यवार ब्यौरा इस प्रकार है- लक्षद्वीप (2.5 प्रतिशत), मिजोरम (2.7 प्रतिशत), नगालैंड (8.75 प्रतिशत), मेघालय (11.53 प्रतिशत), जम्मू व कश्मीर (28.44 प्रतिशत), अरुणाचल प्रदेश (29 प्रतिशत), मणिपुर (31.39 प्रतिशत), और पंजाब (38.40 प्रतिशत)। लेकिन हिंदुओं को इन राज्यों में अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त नहीं है।

केंद्र के हलफनामे के अनुसार राज्यों का तो बाद में, पहले अब तय हो जाए कि एनसीएम (राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग) एक्ट के अंतर्गत केंद्र को प्राप्त आधिकार संवैधानिक रूप से वैध है या नहीं।

संविधान की धारा 29, 30 और 350(ए) में 'अल्पसंख्यकों' का जिक्र आता है, मगर इसकी कोई परिभाषा नहीं है। एनसीएम (राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग) एक्ट, 1992 के अंतर्गत केंद्र अधिसूचना जारी करता है और उसमें भी इसकी परिभाषा स्पष्ट नहीं है। अभी तक सिर्फ धार्मिक आधार पर ही अल्पसंख्यक दर्जा मिलता रहा है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट के अंतर्गत 23 अक्तूबर 1993 को केंद्र ने मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी को 'अल्पसंख्यक' समुदाय का दर्जा दिया। जनवरी, 2014 में जैन भी उसमें शामिल हो गए जबकि धारा-29 में दूरदराज की अलग-थलग पड़ी भाषा, लिपि, संस्कृति वाले अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा का प्रावधान है। 2003 में टीएमए पार्क फाउंडेशन वाले विवाद में सुप्रीम कोर्ट के 11 जजों की पीठ ने कहा कि अल्पसंख्यकों की किसी विशेष परिभाषा के अभाव में, चाहे वो धार्मिक हो या भाषाई, ऐसे जिस समुदाय की राज्य में 50 प्रतिशत से कम संख्या हो, वे अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा पाने के हकदार हैं। केंद्र सरकार ने अभी अपने हलफनामे में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान के लिए राष्ट्रीय आयोग एक्ट, 2005 का भी हवाला दिया है, और कहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर तथा राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की परिभाषा तय है। अल्पसंख्यक दर्जे की बात आरक्षण की तरह सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछड़े कम आबादी वाले समुदायों के लिए शुरू में उठी थी। लेकिन कानून बनने के समय इसका आधार सिर्फ धर्म रह गया।

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