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राजेश बादल का ब्लॉग: फैसला ऐतिहासिक, पर चुनौतियां अभी और भी हैं

By राजेश बादल | Updated: August 6, 2019 04:57 IST

इस ऐतिहासिक कदम के बाद भी भारत की राह आसान नहीं है. नए ढांचे में अब कश्मीर की पूरी जिम्मेदारी केंद्र पर आ गई है इसलिए उसकी कामयाबी की गारंटी भी उसे ही देनी पड़ेगी. इसके लिए उसे अनेक स्तरों पर काम करना होगा.

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कश्मीर को धारा 370 का कवच अब नहीं मिलेगा. दशकों से कश्मीर इस कारण खोल से बाहर नहीं निकल रहा था और इन्ही बंद दरवाजों के चलते विकास की बयार वहां नहीं पहुंच रही थी. इस बात को समझने में अभी समय लगेगा कि दरअसल इस धारा के चलते कश्मीर के लोगों ने अपना बहुत नुकसान भी किया है. कश्मीर के नाम पर केंद्रीय मदद और स्थानीय सियासत के दांव-पेंचों में उलझे वहां के लोग दो पाटों में पिस रहे थे. इस का भरपूर फायदा पाक ने उठाया.

विडंबना है कि कश्मीर के दलों को छोड़ कमोबेश सारे राजनीतिक दल अंदरखाने इस संवैधानिक प्रावधान के विरोध में थे, लेकिन बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस कोई नहीं जुटा पाया. भाजपा सरकार ने अगर यह निर्णय लिया है तो इसका राजनीतिक लाभ उसे क्यों नहीं मिलना चाहिए? अगर आयरन लेडी इंदिरा गांधी के बैंक राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स समापन, बांग्लादेश निर्माण, सिक्किम का विलय और पंजाब में आतंकवाद के खात्मे का फायदा कांग्रेस को मिला है तो मोदी सरकार भी इसकी हकदार है.

अक्सर यह कहा जाता है कि 1947 में कश्मीर विलय के समय इस धारा के जरिए घाटी को जोड़ने का फैसला गलत था. सियासत में काल खंड के हिसाब से स्थितियां बदलती रहती हैं. जब बारह अगस्त 1947 को कश्मीर के राजा हरिसिंह हिंदुस्तान और पाकिस्तान से कह चुके थे कि वे अपनी रियासत का विलय न पाकिस्तान में करेंगे और न हिंदुस्तान में, तो भी हमने स्वीकार कर लिया था. अलबत्ता पाकिस्तान के मन में कपट पहले दिन से था. कबाइली हमले के पीछे पाकिस्तान की मंशा भी यही थी कि हिंदुस्तान के कश्मीर से अलग होने का लाभ उठाकर वह बलूचिस्तान की तरह कश्मीर पर भी कब्जा कर सकता है.

अगर उसकी मंशा पूरी हो जाती तो कल्पना करिए कि एक तरह से भारत की गर्दन पर उसका कब्जा हो जाता. फिर दिल्ली उसके लिए कितनी दूर रह जाती. दूरगामी खतरे को भांपते हुए तत्कालीन सरकार ने अगर कश्मीरियत की पहचान के नाम पर इस धारा को जोड़ा तो इसमें अनुचित कुछ नहीं था. उस समय भी कश्मीर के प्रतिनिधियों को कुछ शंकाएं थीं. जब 370 का प्रावधान हुआ तो वे शंकाएं समाप्त हो गईं. इसी कारण संविधान में इस धारा की शुरुआत में ही इसे अस्थाई बताया गया था.

इस हकीकत से कौन इनकार कर सकता है कि देश-निर्माण के समय जितनी रियासतों के साथ विलीनीकरण समझौते किए गए, वे वास्तव में अस्थाई तंतु थे, जो दुर्घटना के बाद लगे टांकों के धागों की तरह भारत की देह में घुलमिल गए.

कश्मीर में ऐसा नहीं हो सका क्योंकि 13000 वर्ग किमी का क्षेत्न पाक ने हड़प लिया था और उस हिस्से में किसी घुलनशील धागे से टांका नहीं लगाया जा सका था. रह-रह कर दर्द उठना और मवाद रिसना कश्मीर की नियति बनी रही.

बहरहाल! इस ऐतिहासिक कदम के बाद भी भारत की राह आसान नहीं है. नए ढांचे में अब कश्मीर की पूरी जिम्मेदारी केंद्र पर आ गई है इसलिए उसकी कामयाबी की गारंटी भी उसे ही देनी पड़ेगी. इसके लिए उसे अनेक स्तरों पर काम करना होगा. सबसे पहले  पाकिस्तान के दुष्प्रचार और आतंकवादी घटनाओं पर पूरी तरह अंकुश लगाना आवश्यक है. सीमा पार से किसी भी कीमत पर उग्रवाद को रोकना ही होगा. अगर यह संक्रामक वायरस फैलता रहा तो कश्मीर के लोगों का दिल जीतना कठिन हो जाएगा.

दूसरा काम तेज गति से बुनियादी ढांचे के विकास का है. नौजवानों को कश्मीर में ही सौ फीसदी रोजगार देना पड़ेगा. विकास का होना जितना जरूरी है, उससे अधिक आवश्यक है विकास का दिखना. इससे इस सच्चाई को स्थापित करने में सहूलियत होगी कि असल में अनुच्छेद 370 कश्मीरी अवाम के हित में नहीं था. हर हाथ को काम और भरपूर दाम इस खूबसूरत इलाके में शांति का सबूत है. इसके बाद कश्मीरी पंडितों की घर वापसी भी अत्यंत अनिवार्य है. अब उनके पुश्तैनी घर तो रहे नहीं. लिहाजा उनके अपने शहर, गांव और कस्बे में एक नई टाउनशिप बनाना और उसके बाद बसाने का काम प्राथमिकताओं की सूची में सर्वोच्च स्थान पर होना चाहिए.

कश्मीर के कुटीर उद्योग दशकों तक वहां की अर्थव्यवस्था का आधार रहे हैं. उन्हें फिर जिंदा करना होगा. अन्य राज्यों के नौजवानों की तरह कश्मीर का युवा भी इसी सोच का है. अगर अपने घर में उसे दस हजार रुपए महीने की नौकरी मिलेगी तो वह पच्चीस हजार के लिए बाहर नहीं जाएगा. इस मंत्न को हुकूमत समझे तो बेहतर. ध्यान देने की बात है कि अगर हम कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहते हैं तो उसे अभिन्न अंग बनाना भी पड़ेगा. यह जिम्मेदारी पाकिस्तान की नहीं है.

टॅग्स :धारा ३७०जम्मू कश्मीरआर्टिकल 35A (अनुच्छेद 35A)मोदी सरकार
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