राहुल गांधी की बहन होना उनके लिए अभिशाप हैं, रॉबर्ड वाड्रा की पत्नी होना उनके लिए 'बद्दुआ' है और गांधी-नेहरू के खानदान का होना उनकी ताक़त। उनके परदादा उनकी दादी को जेल से ख़त लिखा करते थे। वे भारतीय राजनीति के सबसे ताक़तवर खानदान की बेटी हैं। पिछले पांच सालों तक जब मोदी देशव्यापी नारे "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" को बुलंदियों तक ले जा रहे थे, इस दौरान वे स्वैच्छिक गुमनाम सी ज़िन्दगी जी रही थीं। वे पढ़ी हैं, बची हैं साथ ही वंशवाद की राजनीति में ठीक-ठाक उम्मीदवार भी हैं।
बीजेपी के "सुकन्या समृद्धि-योजना" का वे प्रत्यक्ष लाभ हैं, जो महत्तम व्याज के लाभांश सहित कांग्रेस को मिलने जा रही हैं। प्रियंका बीजेपी में होती तो बहुत पहले अपने सुनहले करियर के कई अध्याय लिख चुकी होतीं।
उनके पति किसान समझे जाते हैं लेकिन वे खेत में नज़र नहीं आते। उनकी सेल्फी महंगे जिम में कसरत करते हुये अपलोड होती है। उनका इस्तेमाल विपक्ष वाले राजनीतिक जिमखाने में पंचिंग बैग की तरह करते हैं। उनकी कहानी "बढ़ेरा से वाड्रा" बनने तक....मनमोहन देसाई के फिल्मों जैसी आकर्षक है।
इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहा जाता था। उनके प्रोत्साहन के लिए चतुर राजनेता रणनीति बनाते थे। और उनकी नर्चरिंग के बहुत से किस्से लोगों के ज़हन में आज भी ताजा हैं। किसी ने कल्पना भी न की होगी कि यह गूंगी गुड़िया एक दिन परमाणु बम फोड़ेगी, देश में इमरजेंसी लाएगी और दुर्गा की अवतार बोली जायेगी।
देशी प्रजातंत्र में प्रजा जनप्रतिनिधि को भी राजा की तरह देखती है। उसे हंटर मारने वाला शासक ज्यादा ईमानदार लगता है। लोग आज भी इंदिरा गांधी के शासन को मानक मानते हैं। पुरनिये तो हंटर से इतने आक्रांत थे कि ब्रितानियों के अनुशासन को सर्वोच्च पायदान पर रखते थे। ऐसी दशा में जनता के लिए प्रियंका से बेहतर उम्मीदवार कौन हो सकता है? प्रजा तो प्रियंका में उनकी दादी की छवियों को ही देखती आ रही है।
कांग्रेस का वंशवाद खानदानी राजनीति का पैरामीटर है। लेकिन इकलौती कांग्रेस ही है जो मर्दवादी हठधर्मिता पर भी आरूढ़ है। कांग्रेस के दरबारी कवि-कवयित्रियों ने गोधना कूटकर मर्दवाद पर तीखी और चिलचिलाती कविताएं लिखी हैं, लेकिन प्रियंका के सहानुभूति में एक भी कविता आजतक मुझे नहीं दिखी। संसद में मीसा भारती हैं, डिंपल यादव हैं, पूनम महाजन हैं और न जाने कितने क्षत्रपों की बहू-बेटियां हैं। लायक-नालायक वंशजों की फसल वहां लहलहा रही है, लेकिन सोनिया ने प्रियंका को उस लायक नहीं समझा। शायद अब समझ रहीं हैं, किंतु वहां भी नीयत शुचितापूर्ण नहीं लगती।
कुछ जानकार मान रहे हैं कि "नेशनल हेराल्ड" केस में राहुल और सोनिया पर कानूनी शिकंजा कस सकता है। शायद उन्हें जेल जाना पड़े। ऐसे में नेतृत्वविहीन कांग्रेस की कल्पना किसी दुःस्वप्न सरीखा है। तो ज़ाहिरन उस गाढ़े समय के लिए डूबते पोत को बचाने हेतु गांधी परिवार का ख़ून अपरिहार्य होगा। और प्रियंका से बेहतर विकल्प कांग्रेस के पास नहीं है।
बीजेपी चाहे तो बिहार वाले फार्मूले की तरह यूपी में भी पिछड़ा-अतिपिछड़ा, दलित और महादलित जैसा समीकरण बिठा सकती है। इससे यूपी की राजनीति को पैनिक किया जा सकता है। यहां पिछड़ा मतलब यादव और दलित मतलब हरिजन रह गया है। कई कुशवाहा, पटेल और सोनकर पहले से राजनीतिक महत्वाकांक्षा की ताल ठोंक रहे हैं। यदि यह पाॅप-पप कांग्रेस के दिमाग में कौंधा तो अनुप्रिया पटेल समेत कई राजनीतिक दल प्रियंका का दामन थाम लेंगे। यदि बीजेपी ऐसा नहीं करती है तो पुराना ढर्रा बीजेपी को ज्यादा दिन सत्ता-सुख लेने नहीं देगा।