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प्रकाश बियाणी का ब्लॉग: सीमित संसाधनों में भी डटे हुए हैं चिकित्साकर्मी

By Prakash Biyani | Updated: March 27, 2020 05:48 IST

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्नालय के सर्वे के अनुसार हमारे देश में 11,600 लोगों के लिए एक चिकित्सक है. 84 हजार भारतीयों के लिए देश में एक आइसोलेशन बेड, 36 हजार के लिए एक क्वारंटाइन बेड उपलब्ध है. देश में लगभग 40 हजार वेंटिलेटर हैं और यह भी सरकारी मेडिकल कॉलेजों या शहरों के निजी अस्पतालों में ही है. जरा ग्रामीण भारत के बारे में तो सोचें. 135 करोड़ भारतीयों में से 67 फीसदी आबादी गांवों में रहती है जहां 10,900 लोगों के लिए एक चिकित्सक है. अन्य हेल्थ केयर संसाधनों को तो भूल ही जाइए.

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भारतीय चिकित्सकों, नर्सिग स्टाफ, टेस्टिंग लैब्स और सफाईकर्मियों को सलाम. हम सब तो खुद को बचाने के लिए कोरोना वायरस से लड़ रहे हैं पर वे हमें बचाने के लिए खुद की जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं. यह कृतज्ञता ज्ञापन तब और जरूरी हो जाता है जब इन्हें अपने लिए प्रोटेक्शन किट्स नहीं मिल रहे हैं फिर भी वे बिना विश्रम-विराम सेवारत हैं. विडंबना यह है कि उन्हें संक्रमित लोगों का उपचार भी न्यूनतम संसाधनों से ही करना पड़ रहा है.

जी हां, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्नालय के सर्वे के अनुसार हमारे देश में 11,600 लोगों के लिए एक चिकित्सक है. 84 हजार भारतीयों के लिए देश में एक आइसोलेशन बेड, 36 हजार के लिए एक क्वारंटाइन बेड उपलब्ध है. देश में लगभग 40 हजार वेंटिलेटर हैं और यह भी सरकारी मेडिकल कॉलेजों या शहरों के निजी अस्पतालों में ही है. जरा ग्रामीण भारत के बारे में तो सोचें. 135 करोड़ भारतीयों में से 67 फीसदी आबादी गांवों में रहती है जहां 10,900 लोगों के लिए एक चिकित्सक है. अन्य हेल्थ केयर संसाधनों को तो भूल ही जाइए.

यह सोचकर भी डर लगता है कि कोरोना महामारी हमारे देश में तीसरे चरण में प्रवेश कर गई और चीन, इटली, ईरान और अमेरिका की तरह कोरोना संक्रमित लोग अस्पताल पहुंचने लगे तो क्या होगा? प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी ने इस हालात का आकलन करके ही 21 दिन का लॉकडाउन लागू किया है और वे बार-बार कह रहे हैं कि घर की देहरी न लांघें और सामाजिक दूरी बनाए रखें. चिंताजनक बात यह है कि हमारे बीच ऐसे लोग मौजूद हैं जो इस महामारी को मजाक समझ रहे हैं.

प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कोरोना से लड़ने के लिए 15 हजार करोड़ रुपए का पैकेज भी घोषित किया है. सरकार यह पैसा पर्सनल प्रोटेक्शन उपकरण, बेड्स, वेंटिलेटर्स, पैरामेडिकल स्टाफ की ट्रेनिंग पर खर्च करेगी पर क्या देश की आबादी की स्वास्थ्य संबंधी जरूरत यह राशि पूरी कर पाएगी? कोरोना महामारी संकेत है कि अब दो देशों में आमने-सामने की लड़ाई नहीं होगी. सारी दुनिया को शंका है कि कोरोना वायरस प्रकृतिजन्य प्रकोप नहीं है यह रासायनिक युद्ध है. खबर है कि चीन में एक और वायरस हंता का भी प्रकोप हो रहा है. स्पष्ट है कि अब दुनिया के हर देश को ऐसे हमलों का बार-बार मुकाबला करने की तैयारी में रहना चाहिए. अमेरिका और इटली जैसे संपन्न और विकसित देशों ने भी कोरोना महामारी के सामने घुटने टेक दिए हैं. नरेंद्र मोदी सही कह रहे हैं कि 21 दिन की लापरवाही देश को 21 साल पीछे ले जाएगी. अभी तो भारत सहित दुनिया की सारी सरकारें अपने लोगों की जान बचाने में लगी हुई हैं. कोई नहीं बता सकता कि कोरोना महामारी से मुक्त होने के बाद अर्थव्यवस्था को ट्रैक पर आने में कितने साल लगेंगे और सरकार को कितने कड़े फैसले लेने पड़ेंगे.

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