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जुबान संयम में हो तो दरार पैदा ही न हो?, मंत्रियों को बोलते समय संयम बरतना

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 21, 2025 05:15 IST

LMOTY 2025: मंत्रियों को बोलते समय संयम बरतना चाहिए. युवा मंत्री कुछ बोल जाते हैं तो उन्हें समझाते हैं कि अब आप पार्टी के नेता के साथ मंत्री भी हैं.

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ठळक मुद्देसवाल पैदा होता है कि जिम्मेदार पदों पर आसीन लोग अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं समझते? राजकाज में उनकी निजी विचारधारा या निजी पसंद या निजी नापसंदगी की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. आम आदमी की जिंदगी को सहज, सुखी और सुविधाओं से परिपूर्ण कैसे बनाया जाए.

LMOTY 2025: लोकमत महाराष्ट्रीयन ऑफ द ईयर अवार्ड 2025 से सम्मानित मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अवार्ड समारोह में बड़ी महत्वपूर्ण बात कही है कि मंत्रियों को बोलते समय संयम बरतना चाहिए.  राकांपा (शरद पवार गुट) के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मंत्री जयंत पाटिल उनका साक्षात्कार ले रहे थे और उन्होंने फडणवीस से पूछा कि सरकार में शामिल कुछ जिम्मेदार लोग एक खास समुदाय के खिलाफ जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उससे दरार पैदा होती है, उसके बारे में फडणवीस की राय क्या है? फडणवीस ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को याद करते हुए कहा कि सबको राजधर्म का पालन करना चाहिए. मंत्रियों को बोलते समय संयम बरतना चाहिए. युवा मंत्री कुछ बोल जाते हैं तो उन्हें समझाते हैं कि अब आप पार्टी के नेता के साथ मंत्री भी हैं.

निश्चित रूप से फडणवीस ने जो कहा है वह आज की सबसे बड़ी जरूरत है क्योंकि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग जब दरार पैदा करने वाली या किसी की भावना को ठेस पहुंचाने वाली बात करते हैं तो इससे माहौल खराब होता है और इसका असर समाज की एकता पर पड़ता है. सवाल पैदा होता है कि जिम्मेदार पदों पर आसीन लोग अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं समझते?

वे क्यों भूल जाते हैं कि उन्होंने संविधान की शपथ ली है और राजकाज में उनकी निजी विचारधारा या निजी पसंद या निजी नापसंदगी की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. भूमिका केवल यह होनी चाहिए कि आम आदमी की जिंदगी को सहज, सुखी और सुविधाओं से परिपूर्ण कैसे बनाया जाए. आम आदमी को फिरकों में नहीं बांटा जा सकता.

आम आदमी तो आम आदमी है. हमने पहले के नेताओं को देखा है कि भीषण वैचारिक मतभेद के बावजूद वे एक-दूसरे का सम्मान करते थे और सदन में विपक्ष की राय को भी उतना ही महत्व दिया जाता था जितना कि सत्ता पक्ष के किसी मंत्री या विधायक को. लेकिन वक्त के साथ परिस्थितियां विकृत होती चली गई हैं.

सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे को धराशायी कर देने के लिए उतावले नजर आते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब सभी राजनीतिक दलों का लक्ष्य एक ही है कि आम आदमी कैसे सुखी जीवन जीए और प्रदेश और देश कैसे आगे बढ़े तो फिर यह तकरार क्यों? बात केवल महाराष्ट्र की नहीं है. दूसरे राज्यों में भी यही हाल है.

बल्कि यूं कहें कि कुछ राज्यों में तो जाति और धर्म की राजनीति इतनी प्रबल हो चुकी है कि वहां विकास का मसला ही पीछे रह गया है. राजनीतिक दलों के कुछ नेता खुद को किसी जाति, समाज या धर्म का प्रबल रक्षक बताने की होड़ में रहते हैं और इसी होड़ के कारण वे ऐसी बातें बोल जाते हैं जिससे समाज टूटता है, समाज में अविश्वास का वातावरण पैदा होता है.

बल्कि यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि विभिन्न राज्यों में ऐसे कई नेता हैं जिनकी राजनीति में नफरत छिपी हुई है. देवेंद्र फडणवीस की सीख ऐसे सभी नेताओं के लिए है जो नफरत के बीज बो रहे हैं. किसी ने बहुत सही कहा है...

ये जुबान जैसी हो, वैसा गुल खिला देमीठी हो तो आंधी को मंद हवा बना देकड़वी होते ही चिंगारी को आग बना दे!इसलिए जुबान पर लगाम रखना बहुत जरूरी है श्रीमान! घर में आग भी ये लगाती है, आग को शांत भी ये कराती है.

टॅग्स :लोकमत महाराष्ट्रीयन ऑफ द ईयर अवार्ड्स 2024देवेंद्र फड़नवीसBJPअटल बिहारी वाजपेयी
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