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कृष्ण प्रताप सिंह का ब्लॉग: इस साल भी महंगाई पर लगाम लगने के नहीं दिख रहे आसार

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 5, 2020 13:08 IST

खासकर, जब देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर लगातार गोते लगा रही है, छोटे-बड़े सारे कामधंधों और रोजी-रोजगार का हाल बुरा है, लोगों की आय बढ़ने को कौन कहे, घटने लगी है और उस घटी हुई के भी बनी रहने पर अनिश्चितताओं के बादल गहरा रहे हैं. ऐसे में महंगाई का नया दौर आरंभ होगा और लोगों को वस्तुओं व सेवाओं के पहले से ज्यादा दाम चुकाने पड़ेंगे तो सब कुछ महंगाई के हवाले हो जाएगा.

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नए साल के पहले ही दिन जेब कटी हुई-सी लगने लगे, साथ ही अंदेशा सताने लगे कि महंगाई का नया दौर जल्दी ही जिस्म से वह खाल भी उधेड़ लेगा जो पिछले साल की निगाह में न आने के कारण सलामत रह गई थी, तो भले ही सदी के महानायक अमिताभ बच्चन कहें कि 2019 और 2020 के बीच का फर्क19-20 जैसा यानी बेहद मामूली है, आम आदमी को तो यह गैरमामूली ही नजर आना है, जनवरी की कड़कती ठंड में भी उसे पसीने से नहाना ही नहाना है.

खासकर, जब देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर लगातार गोते लगा रही है, छोटे-बड़े सारे कामधंधों और रोजी-रोजगार का हाल बुरा है, लोगों की आय बढ़ने को कौन कहे, घटने लगी है और उस घटी हुई के भी बनी रहने पर अनिश्चितताओं के बादल गहरा रहे हैं. ऐसे में महंगाई का नया दौर आरंभ होगा और लोगों को वस्तुओं व सेवाओं के पहले से ज्यादा दाम चुकाने पड़ेंगे तो सब कुछ महंगाई के हवाले हो जाएगा.  

रेलवे ने झारखंड के विधानसभा चुनाव में सत्तादल की संभावनाएं उजली रखने के लिए किरायावृद्धि का जो फैसला रोक रखा था, नए साल के आगाज के साथ ही लागू कर दिया है, जबकि दूसरी एजेंसियों ने हवाई सफर को भी महंगा करने के भरपूर जतन कर दिए हैं- विमानों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन ढाई प्रतिशत से ज्यादा महंगा करके, जिससे इस ईंधन के दाम सात महीनों के उच्चतम स्तर पर जा पहुंचे हैं.

गौरतलब है कि ऐसा उस देश में हो रहा है, जहां प्रधानमंत्नी हवाईयात्ना को हवाई चप्पल पहनने वालों की भी पहुंच में लाने का सपना दिखा चुके हैं. पिछले दिनों उन्होंने इसके लिए एक महत्वाकांक्षी योजना भी घोषित की थी, लेकिन अब सरकारी व गैरसरकारी एयरलाइनों के नकदी की किल्लत समेत कई संकटों से घिर जाने के मद्देनजर उसको चर्चा से ही बाहर कर दिया गया है.

रेलवे ने बजट से पहले ही हर हजार किमी की यात्ना पर दस से चालीस रुपए का अतिरिक्त बोझ डाल दिया है. लेकिन बजट को अलोकप्रिय होने से बचाने के लिए उससे पहले ही राजस्व जुटाने की इस कवायद से उसे 2300 करोड़ रुपए ही मिलने का अनुमान है. ऐसे में बजट में किराये या मालभाड़े, जिसे अभी बख्श दिया गया है, में और वृद्धि की जरूरत महसूस की गई तो बुलेट ट्रेन की मृगमरीचिका की आड़ तो है ही. यह आड़ भी नहीं चली तो रेलयात्ना को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने के सब्जबाग से काम लिया जाएगा. फिर कौन पूछेगा कि रेलयात्ना को आम आदमी के मानकों के मुताबिक कब बनाया जाएगा?

रसोई गैस की बात करें तो प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी अपने पिछले कार्यकाल में निचले तबके तक उसका लाभ पहुंचाने के लिए ‘उज्ज्वला’ जैसी महत्वाकांक्षी योजना ले आए तो उम्मीद की जा रही थी कि वे सिलेंडरों के दाम भी निचले तबके की क्रयशक्ति के अनुरूप ढालने के जतन करेंगे. योजना की सफलता के लिए ऐसा करना जरूरी भी था क्योंकि उसके तहत दिया गया सिलेंडर मुफ्त में रिफिल नहीं किया जाता. इस कारण उसके अनेक बेबस लाभार्थी फिर से उपले-कंडे वाले दौर में लौट गए हैं. लेकिन अब उनकी फिक्र  गैरजरूरी मान ली गई है, क्योंकि 14.2 किलो वाले रसोई गैस सिलेंडर के दाम फिर से बढ़ गए हैं.

कवि शलभ श्रीराम सिंह ने शायद इन्हीं हालात के लिए अपनी ‘सिक्कों से लड़ा जाने वाला युद्ध’ शीर्षक कविता में लिखा था- ‘सौ रुपए किलो/ पालक खरीदने के लिए/तैयार हो रहा है देश/तैयार हो रहा है जनगण/एक कभी न खत्म होने वाले युद्ध के लिए/सिक्कों से लड़ा जाने वाला यह युद्ध/शुरू हो चुका है पृथ्वी पर.’ हम सौ रुपए किलो पालक न सही, प्याज तो खरीदने ही लगे हैं और जहां तक सिक्कों से लड़े जाने वाले युद्ध की बात है, अपने देश में नए साल में इसके और विकट होने के आसार अभी से दिख रहे हैं, जब पूत के पांव पालने में ही हैं.

टॅग्स :इंडियामुद्रास्फीतिमोदी सरकारलोकमत हिंदी समाचार
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