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कन्दाड़ और इंद्रोलीः गांव वालों का ये फैसला वाकई कमाल का है...!

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: November 25, 2025 05:30 IST

Kandad and Indraoli: फैसला केवल पुरुषों ने लिया और खबर है कि महिलाओं ने इस फैसले को स्वीकार कर लिया है. सोने के गहनों को लेकर भारतीय महिलाओं का प्रेम सर्वविदित है.

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ठळक मुद्देबड़ी प्रतिष्ठा की बात होती है कि किस महिला ने कितने गहने पहन रखे हैं. मध्यमवर्गीय परिवार के लिए गहने बनवाना मुश्किल कर दिया है.फैसला संभवत: किसी और गांव या शहर ने नहीं लिया है!

Kandad and Indraoli: उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर के दो गांवों कन्दाड़ और इंद्रोली गांव ने एक अनोखा फैसला लिया है. अब वहां की महिलाएं शादी-ब्याह में केवल तीन गहने पहनेंगी-नाक की फूली, कान के बूंदे और गले में मंगलसूत्र! यह कदम सोने की बढ़ती कीमतों के कारण उठाया गया है. वैसे दिलचस्प बात है कि इस फैसले में महिलाएं शामिल नहीं थीं. फैसला केवल पुरुषों ने लिया और खबर है कि महिलाओं ने इस फैसले को स्वीकार कर लिया है. सोने के गहनों को लेकर भारतीय महिलाओं का प्रेम सर्वविदित है.

किसी आयोजन के समय तो यह बड़ी प्रतिष्ठा की बात होती है कि किस महिला ने कितने गहने पहन रखे हैं. इसी कारण से महिलाएं ज्यादा से ज्यादा गहने बनवाना चाहती हैं. मगर सोने के भाव जिस तरह से तेजी से बढ़ते चले गए हैं, उसने मध्यमवर्गीय परिवार के लिए गहने बनवाना मुश्किल कर दिया है.

कन्दाड़ और इंद्रोली गांव के लोगों ने सोचा कि क्यों न पैर उतना ही फैलाया जाए जितनी बड़ी चादर है: ज्यादातर लोग खेती-किसानी से जुड़े हैं इसलिए उन्होंने तय कर लिया कि तीन ही गहने पहनने की अनुमति होगी. जाहिर सी बात है कि पूरे देश में सोने का लेकर इस तरह का फैसला संभवत: किसी और गांव या शहर ने नहीं लिया है!

इस फैसले ने निश्चय ही गांव में सुकून फैलाया होगा क्योंकि अब जब तीन से ज्यादा गहने पहनना ही नहीं है तो ज्यादा गहने बनवाने के लिए महिलाएं दबाव नहीं डालेंगी. शादी में भी दुल्हन इतने ही गहने पहनेगी तो उसके लिए भी कर्ज लेकर गहने बनवाने की नौबत नहीं आएगी! इन दोनों गांवों के फैसले के निहितार्थ को यदि महसूस किया जाए तो यह फैसला वाकई कमाल का है.

भारतीय संस्कृति में परंपरा रही है कि केवल उपलब्ध संसाधनों से ही काम चलाया जाए. मगर आधुनिकता और वैश्विकता के प्रसार के साथ यह देखने में आया है कि हमारी जितनी हैसियत नहीं होती, उससे ज्यादा संसाधनों के लिए हम परेशान रहते हैं. वास्तव में जिनकी हैसियत कर्ज की किश्त चुकाने लायक नहीं होती, वे विभिन्न उपकरण से लेकर कार तक खरीद लेते हैं.

इस तरह बहुत से लोग कर्ज के कुचक्र में फंस जाते हैं और उनका पूरा जीवन ईएमआई चुकाने में गुजर जाता है. शादी-ब्याह में तो स्थिति और भी खराब होती है. देश के ज्यादातर इलाकों में आज भी दहेज प्रथा का बोलबाला है और लड़के के पिता को कई बार कर्ज लेकर सामाजिक परंपरा का निर्वाह करना पड़ता है. जाहिर सी बात है कि यदि दिखावा कम हो जाए तो बहुत सारी समस्याओं का निदान स्वयं ही निकल आएगा. उत्तराखंड के इन दोनों गांवों से देश के दूसरे गांवों को भी सीख लेनी चाहिए.

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