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पाक में आतंकवाद रोकना भारत और अमेरिका के लिए जरूरी

By अवधेश कुमार | Updated: September 30, 2021 15:24 IST

बाइडेन ने मोदी को याद दिलाया कि उपराष्ट्रपति रहते उन्होंने कहा था कि 2020 तक भारत-अमेरिकी संबंध ऊंचाइयों पर होंगे. उन्होंने ट्वीट भी किया कि आज मैं व्हाइट हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत कर रहा हूं.

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ठळक मुद्देअमेरिका के उपराष्ट्रपति की जगह भारतीय मूल की कमला हैरिस बैठ रही है तालिबान के आंतकवाद, जलवायु परिवर्तन और चीन को लेकर हुई चर्चासबसे बड़ी चुनौती फिर से साख और प्रभाव को पुनर्स्थापित करना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा पर संपूर्ण दुनिया की नजर थी. बाइडेन और मोदी की बैठक एक घंटे के लिए निर्धारित थी लेकिन डेढ़ घंटे तक चली. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि बातचीत में कितने विषय और बिंदु शामिल रहे होंगे. यह अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत के संदर्भ में भावना और इसके महत्व का द्योतक है.

बाइडेन ने मोदी को याद दिलाया कि उपराष्ट्रपति रहते उन्होंने कहा था कि 2020 तक भारत-अमेरिकी संबंध ऊंचाइयों पर होंगे. उन्होंने ट्वीट भी किया कि आज मैं व्हाइट हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत कर रहा हूं. उन्होंने कहा कि आप जिस कुर्सी पर बैठ रहे हैं इस पर उपराष्ट्रपति के रूप में मैं बैठता था और अब उपराष्ट्रपति कमला हैरिस बैठती हैं और क्या संयोग है कि वह भी भारतीय मूल की हैं. राजनय में इनका महत्व होता है.

इससे पता चलता है कि मेजबान देश आपके प्रति क्या भाव रखता है. वास्तव में बाइडेन से बातचीत के पहले उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से मुलाकात एवं बातचीत में आधारभूमि तैयार हो गई थी. हैरिस ने आतंकवाद को लेकर मोदी की बातों का सार्वजनिक समर्थन किया और कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादी हैं और उसे रोकने का कदम उठाना चाहिए ताकि भारत और अमेरिका दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके. तो यह अमेरिकी प्रशासन की नीति है. इसमें भारत और अमेरिका दोनों की सुरक्षा को समान स्तर पर रख कर बात करना महत्वपूर्ण है. जैसा विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंखला ने बताया कि दोनों मुलाकातों में हिंद प्रशांत क्षेत्र ही नहीं पूरे विश्व में चीन के उभरते खतरे, अफगानिस्तान में तालिबान के बाद आतंकवाद की चुनौतियां, जलवायु परिवर्तन, उभरती तथा उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी में परस्पर सहयोग आदि को लेकर विस्तृत बातचीत हुई.

नि:स्संदेह, मोदी की अमेरिकी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से बातचीत सफल रही. इसमें एक शब्द ऐसा नहीं आया जो भारत की सोच, नीति और भविष्य में दोनों की साझेदारी के विरुद्ध संकेत देने वाले हों. भारतीय मत का इसमें व्यापक समर्थन तथा भविष्य में द्विपक्षीय संबंधों के बहुआयामी चरित्र को और सुदृढ़ करने का ही संदेश आया. बावजूद यह भी साफ है कि भारत को कई मोर्चों पर स्वयं ही लड़ाई लड़नी होगी. आकुस समझौते में भी भारत, जापान को बाहर रखा गया जबकि क्वाड में चारों देश शामिल हैं. पनडुब्बी भारत में क्यों नहीं निर्मित हो सकती? फ्रांस अमेरिका का पुराना साझेदार है. अमेरिका ने समझौता करते हुए उसका भी ध्यान नहीं रखा. फ्रांस ने पांच वर्ष पूर्व ऑस्ट्रेलिया को पनडुब्बी देने का समझौता किया था. फ्रांस ने ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से राजदूत वापस बुला लिए हैं. इस तरह की नीति अकल्पनीय थी. इसको स्वीकार कर ही आगे आना पड़ेगा. बिडेन कई कारणों से इस समय परेशानी का सामना कर रहे हैं. अफगानिस्तान से वापसी को लेकर दुनिया ही नहीं अमेरिका में भी आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

अमेरिकी साख और इकबाल कमजोर हुआ है. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती फिर से साख और प्रभाव को पुनर्स्थापित करने की है. अभी तक इस दिशा में उन्होंने कोई संकेत दिया नहीं. मोदी के साथ दोनों नेताओं की बातचीत में भी इसके कोई संकेत नहीं मिले. अमेरिका भारी कर्ज में भी है. उससे बाहर निकलना भी उसकी समस्या है. जब जो बाइडेन सत्ता में आए थे, उस समय कोरोना का भयानक प्रकोप तेजी से बढ़ा, बीच में थोड़ी कमी आई और इस समय फिर अमेरिका उससे जूझ रहा है. फ्रांस की नाराजगी को स्वभाविक मानते हुए नाटो के साझेदार भी शंका की दृष्टि से अमेरिका को देख रहे हैं.

अमेरिका से जुड़े तथा जहां उसके सैन्य अड्डे हैं, उन देशों के अंदर यह भय पैदा हो गया है कि जब तक उसका स्वार्थ होगा, तब तक वह ठहरेगा और वापस चला जाएगा. चीन इसका लाभ उठाने के लिए आतुर है. ये सब ऐसे मामले हैं जिनको लेकर अमेरिकी प्रशासन के साथ लगातार बातचीत, नेताओं के शीर्ष स्तर पर मुलाकात और उसमें आए निष्कर्षों के अनुरूप साझेदारी को नए सिरे से विकसित करने की आवश्यकता दिखाई पड़ रही है.

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