ताकि आग लगने पर कुआं खोदने की न आए नौबत
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 22, 2026 07:29 IST2026-04-22T07:29:43+5:302026-04-22T07:29:46+5:30
भूमिगत जल का हमने इतना दोहन कर लिया है कि अब गर्मी के दिनों में अधिकांश जगह पेयजल के भी लोगों को लाले पड़ जाते हैं.

ताकि आग लगने पर कुआं खोदने की न आए नौबत
पिछले कई वर्षों तक अच्छी बरसात के बाद इस साल मौसम के थोड़ा दगा देने की आशंका नजर आ रही है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने 2026 के मानसून के लिए सामान्य से कम अर्थात 92 प्रतिशत बारिश का अनुमान जताया है. जाहिर है कि ऐसे हालात से निपटने के लिए पहले से ही तैयारी रखना सबसे अच्छा उपाय है और महाराष्ट्र सरकार वही कर रही है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई में सोमवार को एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक लेकर सभी विभागों को जलप्रबंधन को प्राथमिकता देने, जलसंरक्षण कार्यों में तेजी लाने और समन्वित तैयारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए.
उन्होंने उपलब्ध जल के उचित नियोजन, जल संरक्षण कार्यों में तेजी लाने और पुराने जल स्रोतों की मरम्मत व पुनर्जीवन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि संभावित एल नीनो के प्रभाव को पूर्व नियोजन, प्रभावी क्रियान्वयन और विभागों के बीच समन्वय के माध्यम से कम करना होगा. दरअसल जल संरक्षण पर अगर ध्यान दिया जाए और पानी की बर्बादी रोकी जाए तो आज के तकनीकी विकास के युग में कम पानी में भी जीवन निर्वाह किया जा सकता है.
इजराइल, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड्स और नामीबिया जैसे कई देश बेहतरीन प्रबंधन के बल पर कम पानी में भी अपना काम चला लेते हैं. इजराइल में तो इस्तेमाल किए गए लगभग 90 प्रतिशत पानी को रिसाइकल कर खेती में इस्तेमाल किया जाता है.
‘ड्रिप इरिगेशन’ अर्थात टपक सिंचाई की तकनीक भी वहीं से शुरू हुई थी. लंबे सूखे के इतिहास के कारण ऑस्ट्रेलिया ने भी ‘वॉटर ट्रेडिंग’ और स्मार्ट मीटरिंग में महारत हासिल की है और यहां पानी के उपयोग पर सख्त निगरानी रखी जाती है. जबकि नामीबिया में सीधे सीवर के पानी को रिफाइन कर पीने योग्य बनाया जा रहा है.
हम भारतीय खुशकिस्मत हैं कि दुनिया के बहुत से देशों के मुकाबले हमारे यहां लगभग हर साल भरपूर मानसूनी बारिश होती है, लेकिन दुर्भाग्य से हम उस पानी को अच्छी तरह से संजो नहीं पाते हैं और मानसूनी बारिश का अधिकतर हिस्सा नदियों के रास्ते बहकर समुद्र में चला जाता है.
पुराने जमाने में जब तकनीक आज के जितनी उन्नत नहीं थी, उस समय भी हमारे पुरखों ने जगह-जगह तालाबों का निर्माण किया था, जो बरसात के पानी को संजोकर साल भर हमारे काम में आते थे और भूजल स्तर भी ऊपर उठाने में मदद करते थे. आज तकनीकी विकास के बावजूद, नए तालाबों के निर्माण की कौन कहे, पुराने तालाबों को भी हम अपने छुद्र स्वार्थों की खातिर पाटते जा रहे हैं और पेड़-पौधों को काटकर जंगलों का भी सफाया करते जा रहे हैं.
शहरों में हमने कांक्रीट के जंगल उगा दिए हैं, जिससे बरसात के पानी को जमीन में समाने के लिए जगह ही नहीं मिलती. दूसरी तरफ, भूमिगत जल का हमने इतना दोहन कर लिया है कि अब गर्मी के दिनों में अधिकांश जगह पेयजल के भी लोगों को लाले पड़ जाते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि समुचित नियोजन के बल पर ही जल संकट का मुकाबला किया जा सकता है, इसलिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा समय रहते ही संभावित जल संकट से निपटने की तैयारी करना स्वागत योग्य कदम है.