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Indian democracy: कबीलाई सामंती तंत्र में बदल रहा लोकतंत्र?, धन बल और बाहुबल सियासत पर हावी

By राजेश बादल | Updated: March 12, 2025 04:21 IST

Indian democracy: अफसोस यह है कि राजनीति में उतरने वाली नई नस्लें इस विकृत रूप को ही असल लोकतंत्र समझ बैठी हैं.

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ठळक मुद्देकिसी एक दल को दोष नहीं दिया जा सकता.राजनीतिक पार्टी में इसका दुष्प्रभाव नजर आ रहा है. उत्तराधिकारी खुद को राजकुमार या युवराज समझते हैं.

भारतीय लोकतंत्र का एक विकृत संस्करण इन दिनों हम देख रहे हैं. वैसे तो कुछ दशकों से इस जम्हूरियत में सामंती बीज पनपते दिखाई दे रहे थे. वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आड़ में अंकुरित होते गए. सामूहिक नेतृत्व के स्थान पर जैसे-जैसे धन बल और बाहुबल सियासत पर हावी होता गया, उसमें समूचा तंत्र व्यक्ति के इर्दगिर्द सिमटता गया. यानी जिस रौबदार नेता के पास पैसा और हथियारों से लैस सेना थी, वह हावी होता गया. लोकतंत्र की मूल भावना इस तरह धीरे-धीरे दम तोड़ती गई. एक व्यक्ति के रौब में आकर पार्टियां पनपती रहीं. इसके लिए किसी एक दल को दोष नहीं दिया जा सकता.

कमोबेश प्रत्येक राजनीतिक पार्टी में इसका दुष्प्रभाव नजर आ रहा है. अफसोस यह है कि राजनीति में उतरने वाली नई नस्लें इस विकृत रूप को ही असल लोकतंत्र समझ बैठी हैं. अनेक पार्टियों का आंतरिक ढांचा इस तथ्य का सबूत है कि उनका मुखिया एक राजा की तरह ही व्यवहार करता है. उनके उत्तराधिकारी खुद को राजकुमार या युवराज समझते हैं.

दरअसल भारतीय लोकतंत्र की यह ऐसी सड़ांध या महामारी है, जिसका असर आने वाले दिनों में उजागर होगा. राष्ट्रीय दल बहुजन समाज पार्टी के भीतर का घटनाक्रम इसका ताजा उदाहरण है. राष्ट्र के बौद्धिक मंच पर इसकी चर्चा होनी चाहिए थी. लेकिन कहीं भी इस पर बहस नहीं हुई. बहुजन समाज पार्टी में इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

पार्टी की मुखिया मायावती ने चंद रोज पहले जिस तरह भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से निकाला, वह किसी भी कीमत पर अच्छी राजनीति का लक्षण नहीं है. भले ही वह पार्टी का अंदरूनी मामला था, मगर निकालने से पहले न कोई कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई और न आकाश आनंद से स्पष्टीकरण मांगा गया. वह लोकतांत्रिक ढंग नहीं था.

पर इससे ज्यादा खतरनाक मायावती का अंदाज था, जिस पर सियासी जमात के किसी प्रतिनिधि का ध्यान नहीं गया. उन्होंने दो बरस पहले आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. लेकिन अचानक उनको निकाल दिया गया. इससे पहले उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ तथा पत्नी प्रज्ञा को भी मायावती ने निकाल  दिया था.

आठ बरस पहले आकाश लंदन से पढ़ाई पूरी करके आए थे और मायावती के अनुरोध पर ही पार्टी से जुड़े थे. वे पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक भी थे. लेकिन मायावती के कोप का शिकार हो गए और समन्वयक पद से भी बर्खास्त कर दिए गए. इसके बाद उन्हें पिछले साल लोकसभा चुनाव से पहले फिर प्रमुख दायित्व सौंपे गए.

साल भर पूरा होते-होते आकाश पर फिर गाज गिरी और उन्हें दरवाजा दिखा दिया गया. मायावती से यह सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर उनकी पार्टी में नियुक्तियां क्यों होती हैं? जनतांत्रिक तरीके से निर्वाचन क्यों नहीं कराए जाते? सवाल यह नहीं है कि उन्हें बार-बार जिम्मेदारियां सौंपी गईं और हटाया गया. असल सवाल यह है कि मध्ययुग में जिस तरह राजा या सुल्तान बर्ताव करते थे,

मायावती का रवैया कुछ इसी प्रकार का है. एक राजा अपने किसी एक प्रिय राजकुमार को उत्तराधिकारी चुनता था. वह राजा बन जाता था. लेकिन किन्ही कारणों से राजा उस राजकुमार से खफा हो जाए तो उसको भी हटा देता था. इसी तरह कुनबे का राज चलता था. भारत की आजादी के बाद हमने जिस संवैधानिक लोकतंत्र को अपनाया, उसमें ऐसी राजसी मानसिकता के लिए कोई स्थान नहीं था.

मध्ययुग की मानसिकता के साथ चल रहीं मायावती लंदन में पढ़े-लिखे एक नौजवान से क्या अपेक्षा कर रही थीं? वह भी कबीलाई संस्कृति अपना ले? दो पीढ़ियों के बीच यह तनातनी तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी से लेकर दक्षिण भारत के डीएमके और अन्य मंझोले दलों में वर्षों से चल रही है.

ममता बनर्जी का भतीजे से मतभेद, शरद पवार का भतीजे से मतभेद, अखिलेश यादव का चाचा से मतभेद, झारखंड मुक्ति मोर्चा में पारिवारिक कलह, बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी में चाचा - भतीजे में टकराव और आरजेडी में दो भाइयों के बीच मतभेद कुछ उदाहरण हैं. अलबत्ता भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में इस तरह के उदाहरण कम हैं.

हां उनके व्यवहार और शब्दों में सामंती लहजा अवश्य नजर आने लगा है. मध्य प्रदेश में एक पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा वर्तमान में राज्य सरकार में मंत्री ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दरम्यान अजीबोगरीब बात कही. उन्होंने कहा कि सरकार से भीख मांगने की आदत लोगों की पड़ गई है. कहीं जाते हैं तो मांगपत्र लिए भिखारियों की भीड़ चली आती है.

यह अच्छी बात नहीं है. मंत्रीजी भूल गए कि हर पांच साल बाद वे जनता से वोट की भीख मांगने ही तो जाते हैं. आदर्श स्थिति तो वह होती है कि मतदाता को मांगपत्र देना ही नहीं पड़े. यह उस क्षेत्र के विधायक की असफलता है. इसका अर्थ यह भी निकलता है कि छोटे और मंझोले राजनीतिक दलों ने अपने भीतर सत्ता की भूख तो पैदा की, लेकिन सत्ता के संस्कार अपनी पार्टियों के अंदर पैदा नहीं किए.

वे राष्ट्रीय पार्टियों से समय-समय पर ऐसे समझौते करते रहे जो लोकतंत्र की चिंता कम, अपने स्वार्थों की चिंता अधिक करते थे. मैं जिस कबीलाई सामंती प्रथा का जिक्र कर रहा हूं, उसका मतलब यही है कि यह क्षेत्रीय पार्टियां मुखिया की जाति और उपजातियों के मतदाताओं की ठेकेदार बन गई थीं. भारतीय मतदाता भी अरसे तक इस भ्रम में रहे कि पार्टियां उनके हितों की रक्षा करेंगी.

जब तक क्षेत्रीय पार्टी का राजवंश स्थापित करने वाला शिखर पुरुष जिंदा रहता था, तब तक उसके प्रभाव में ठीक-ठाक सा चलता दिखाई देता था. लेकिन उसके बाद वाली पीढ़ियां उस प्रभाव को बरकरार नहीं रख सकीं, क्योंकि उनकी परवरिश एक राजकुमार की तरह हुई थी. इस तरह हिंदुस्तान में अखिल भारतीय लोकतांत्रिक चरित्र विकसित नहीं हो सका.

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