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Film Review: दुखद सच्चाईयों को समेटती 'होली काऊ'

By इंदु पाण्डेय | Updated: June 1, 2019 17:55 IST

होली कॉऊ फिल्म में जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के प्रो० जोधका कैटल इकॉनमी में गाय और बैल की मांग की ओर इशारा करते हैं।

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हाल ही में कान फिल्म फेस्टिवल में अपनी फिल्म दिखा कर भारत लौटे सूरज कुमार की  फिल्म होली काऊ' चर्चा में है। मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में 17 मई को गोमांस रखने के शक में महिला समेत तीन लोगों की पेड़ से बांधकर मारपीट की गई।

आरोप है कि कथित तौर पर गाय का मांस ले जा रहे दो युवकों और एक महिला को शुभम और उसके साथियों ने रोक लिया था। उन्होंने गाड़ी में गोमांस रखने होने का शक जताया। आरोपियों ने पुलिस को सूचना देने की बजाय तीनों की पिटाई की।

ऐसी खबरें देश के हिंदी पट्टी राज्यों से जगजाहिर होती रहतीं हैं। अभी हाल के वर्षों में किसान के दरवाजे से बूचड़खाने तक गायों के पहुंचाने के अवैध कारोबार को लेकर देश के काऊ-बेल्ट में जमकर हिंसक वारदातें हुई हैं। 

"यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा बल्कि दुधारू पशुओं के कारोबारियों को 'गोमांस व्यापारी' चिन्हित करती भीड़ पहले से कहीं ज्यादा हिंसक होती दिख रही है। यही क्रोध रक़बर खान-पहलु खान-मुहम्मद जुनैद-इम्तयाज खां- मोहमद मजलूम-मोहम्मद अखलाख और कासिम जैसे कुछ नामों की ऐसी फेहरिस्त बनाता है जिसके बहाने हिंसक हो चुके देश के मनमिजाज को समझा सके", डाक्यूमेंट्री फिल्म के निर्माता-निर्देशसक सूरज कुमार कहते हैं।

गाय के नाम पर हिंसा

'होली काऊ' में ऐसे किसी एक घटना का जिक्र नहीं बल्कि देश भर के उग्र भीड़ द्वारा मची हिंसा को बहुत बेबाकी से दिखाया है। 73 मिनट की इस फिल्म में सूरज कुमार ने किसी एक पक्ष का सच और उसके तर्क को रखने के बजाये कहीं ज्यादा स्पेस बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् के प्रतिनिधियों को दिया है जो अपनी हिंसात्मक गतिविधियों को जायज और वाजिब बताते हैं। 

फिल्म शुरू से अपना प्रभाव दिखाने में सफल है जब मानवता पर हावी हो रहे इंसान की पाशविकता के मामले में  विनायक दामोदर सावरकर गाय को माँ का दर्जा दिए जाने पर ऐतराज जाहिर करते हैं कि 'गाय की देखभाल करिये, लेकिन पूजा नहीं।'  सावरकर ने गोमांस के राष्ट्रवाद को लेकर कितना मौंजू सवाल उठाया है कि 'ऐसा क्यों है कि गाय का मूत्र और गोबर तो पवित्र है जबकि अंबेडकर जैसे व्यक्तित्व की छाया तक अपवित्र?     

'होली काऊ'  में एक ओर जहाँ प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो० डीएन झा प्राचीन हिन्दू समाज द्वारा उत्सवों में गोमांस परोसने का हवाला देते हैं वहीं समाजविज्ञानी प्रो० सुरेंद्र सिंह जोधका खेतिहर समाज में गाय के आर्थिक महत्त्व की ओर सबका ध्यान खींचते हैं। उनके मुताबिक 'हरित क्रांति के बाद मशीन पर निर्भर हो चुका किसान बैल रखकर क्या करता।

बूढ़ी और लाचार गाय के लिए हमारे यहाँ किस तरह की संवेदना है ?' वह बेहद बेबाकी से कहते हैं क़ि 'मुसलमान और अनुसूचित जाति का एक ख़ास तबका परंपरागत तौर से गोमांस खाते हैं। और, गाय हिन्दू सेंटीमेंट से जुड़ी है तो विवाद होना लाजिमी है। लेकिन गाय राष्ट्रीय पशु नहीं है।'

घृणा से लबालब अपराध

जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के प्रो० जोधका कैटल इकॉनमी में गाय और बैल की मांग की ओर इशारा करते हैं। प्रो० डीएन झा और  प्रो० जोधका के ऐसे व्यक्तव्यों से इस डाक्यूमेंट्री फिल्म के बहाने जिस बहस की शुरुआत होती है, उसे आज गाय के नाम पर हिंसक होता समाज स्वीकार करेगा ? यही बात इस फिल्म से जुड़े उस जोखिम से है जो सूरज कुमार को हिंसक आलोचना का शिकार बना सकती है।             

 फिल्म में सोशल मीडिया के क्लिपिंग्स का सहारा जरूर लिया गया है लेकिन पीड़ितों का पक्ष कैमरे के आँखों से जानने का जोखिम सूरज कुमार ने उठाया है। सूरज इस फिल्म को बनाने के क्रम में झारखंड के बालूमाथ जैसे लाल-आतंक के गढ़ कहे जाने वाले इलाके में भी जाने से नहीं चूकते। "मुझे इस फिम से कोई पोलिटिकल माइलेज नहीं लेना था। अन्यथा मैं इसे लोकसभा चुनाव के कुछ महीने पहले रिलीज़ कर सकता था", सूरज अपनी बात रखते हैं। 

सूरज कहते हैं "यह फिल्म किसी आरोप का हथकंडा नहीं है बल्कि यह देश के उस शर्मनाक सच्चाई का लिखित प्रमाण भी है", इस फिल्म में जहाँ प्रधानमंत्री के उस चेतावनी को शामिल किया गया है, जब वह अपील करते दिखते हैं कि 'इन नकली गौ रक्षकों से बचिए'- प्रधानमंत्री के इस तरह के गुहार के बावजूद एक ख़ास तरह की आस्था रखनेवाले समाज का वह सच उभर कर सामने आता है जहां वह 'जंगल न्याय' को अपना चुका है।  हिंसा को लेकर उसका यह अपनापन देश के भयावह भविष्य का संकेत भी है। तभी तो पत्रकार मार्क टुली ने इस फिल्म में साफ़ शब्दों में कहा है, 'मोदी के आने के बाद गाय को लेकर हिंसा बढ़ी है।'  

यह फिल्म मूल रूप से अंग्रेजी में है, जिसका हिंदी संस्करण भी उपलब्ध है। सूरज कुमार ने इस फिल्म के बहाने आधुनिक भारत में घृणा से लबालब अपराधों के घृणित रूपक को बेहद संजीदगी से पेश किया है। वह अपनी इस फिल्म में हिंसाचार से अलग बंधुत्व और भाईचारे को अपने अंदर समेटकर 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम' जैसे शब्द-गान के साथ गांधी की शरण में जाना मुनासिब समझते हैं- यह मानी हुई बात है कि कोलाहल करती हिंसा के सामने हारते गांधी आज सचमुच बेहद विवश हो चुके हैं। शायद यही विवशता देश के भविष्य का शाश्वत सच बन जाए।

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