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ब्लॉगः चुनावी लड़ाई को बनाना होगा शालीन

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: October 18, 2023 11:12 IST

लोकसभा चुनाव से पहले देश के पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इन चुनावों में पार्टियों की हार और जीत तय करेगी कि लोकसभा चुनावों में किस पार्टी का पलड़ा भारी रहेगा।

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ठळक मुद्देदिसंबर माह में पांच राज्यों में बनेगी सरकार लोकसभा चुनाव पर होगा पांच राज्यों के चुनाव परिणाम का असर चुनाव के बाद हमारा जनतंत्र कुछ मजबूत होगा या कमजोर

यूं तो पिछले एक अर्से से हमारा देश चुनावी मोड में ही चल रहा है पर अब तो आम चुनाव से पहले के सेमीफाइनल की बाकायदा घोषणा भी हो गई है। शंखनाद हो चुका है। दिसंबर तक पांच राज्यों में नई सरकारें भी बन ही जाएंगी। सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा या कौन हारेगा। सवाल यह है कि इन चुनाव के बाद हमारा जनतंत्र कुछ मजबूत होगा या कमजोर।

जनता के शासन का नाम है जनतंत्र। जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन। चुनावों का होना या फिर वोट देना मात्र ही इस बात का प्रमाण नहीं है कि हमारा जनतंत्र फल-फूल रहा है। वोट मांगने वाले और वोट देने वाले, दोनों का दायित्व बनता है कि वह जनतंत्र की इस पूरी प्रक्रिया में ईमानदारी से हिस्सा लें। आज हमें स्वयं से यह पूछने की आवश्यकता है कि क्या हमारी राजनीति में ईमानदारी नाम की कोई चीज बची है। झूठे वादे करना, धर्म और जाति के नाम पर मतदाताओं को बरगलाना, आधारहीन आरोपों के शोर में विवेक की आवाज को दबा देना। यह सब तो जनतंत्र नहीं है।

दुर्भाग्य यह भी है कि जनतांत्रिक मूल्यों के नकार के इस खेल में कोई पीछे रहना नहीं चाहता। सब अपने-अपने महिमा-मंडन में लगे हैं। आत्म-प्रशंसा से लेकर पर-निंदा तक फैला हुआ है हमारा बदरंग इंद्रधनुष। होना तो यह चाहिए कि राजनीतिक दल अपनी-अपनी रीति-नीति का ब्यौरा लेकर जनता के पास जाएं। पर हमारी समूची राजनीति विरोधियों को कोसने से लेकर अपना ढोल बजाने तक सीमित होकर रह गई है। जो अपने आप को जितना बड़ा नेता समझता-कहता है, वह उतने ही जोर से विरोधी पर लांछन लगाने में लगा है।

अपेक्षित तो यह है कि सत्ता-पक्ष चुनाव के मौके पर अपनी उपलब्धियों का लेखा-जोखा मतदाता के समक्ष प्रस्तुत करे और विपक्ष सत्ता-पक्ष की कमजोरियों और अपनी रीति-नीति के बारे में बताए। बताए कि वह कैसे और क्या बेहतर करेगा। लेकिन ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा। चुनाव के संदर्भ में जो हो रहा है वह एक तो यह है कि विरोधी को नीचा दिखाने की कोशिश और दूसरे, रेवड़ियां बांटने की प्रतिस्पर्धा। बड़ी बेशर्मी से मतदाताओं को लुभाने की होड़-सी लगी है।

एक जमाना था जब मतदान की यज्ञ से तुलना की जाती थी और वोट को तुलसी-दल की पवित्रता प्राप्त थी। अब तो यह चुनाव ऐसी लड़ाई बन गया है जिसमें सब कुछ जायज मान लिया गया है। यहां तक कि विरोधी को अपशब्द कहते हुए भी किसी को कोई शर्म नहीं आती। पर किसी भी कीमत पर जीत हमारे जनतंत्र को खोखला ही बनाएगी।

अभी पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, फिर लोकसभा के लिए चुनाव होंगे। चुनाव के इस माहौल में यह बात समझना जरूरी है कि चुनाव जीत कर सरकार बनाने में सफलता ही जनतंत्र की सार्थकता नहीं है। यह सार्थकता तभी उजागर होगी जब मतदाता के पास चुनने का अधिकार ही नहीं, अवसर भी होगा। मतदाता को स्वयं खोजना होगा यह रास्ता। अपने विवेकपूर्ण निर्णय से ही देश का मतदाता उस लक्ष्य तक पहुंचा सकता है जो किसी भी सुव्यवस्था के लिए अपेक्षित है।

टॅग्स :चुनाव आयोगमध्य प्रदेशPartyकांग्रेसBJPAAP's Uttar Pradesh
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