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ब्लॉग: बाबासाहब के सपने अभी भी अधूरे क्यों..?

By विजय दर्डा | Updated: December 6, 2021 09:00 IST

संविधान हमारे जीवन जीने के मार्ग को प्रशस्त करता है और जीवन के विकास को दिशा देता है. बाबासाहब ने ऐसे ही संविधान की रचना की और द्वेषमुक्त समाज की रचना की राह दिखाई. किसी के साथ कोई अन्याय न होने पाए..न जाति, न धर्म और न भाषा के नाम पर! उन्होंने जीवन जीने की ऐसी शैली दी है जिसमें मुक्त होकर मनुष्य खुद का विकास कर सकता है.

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ठळक मुद्देसिर पर मैला ढोने के लिए मजबूर लोगों की संख्या 43797 है, जिनमें 42594 अनुसूचित जाति के हैं.आज भी प्रताड़ना की खबरें आती रहती हैं. हवा में जाति का विष तैर रहा है.दलितों पर अत्याचार के 120 से ज्यादा मामले प्रतिदिन दर्ज होते हैं.

भारत भूमि को लेकर पौराणिक मान्यता है कि स्वर्ग में रहने वाले देवी-देवता भी रश्क करते हैं कि उनका जन्म यहां क्यों नहीं हुआ..! तो ऐसी पावन भूमि पर अनेक कालखंडों में कई महापुरुष आए लेकिन मैं दो महापुरुषों का खास तौर पर जिक्र करना चाहूंगा. एक महात्मा गांधी और दूसरे भारत रत्न बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर. गांधीजी ने अहिंसा के मार्ग से देश को गुलामी से मुक्त कराया. 

उन्होंने भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के विचारों को आत्मसात किया और अहिंसा, त्याग, क्षमा, अपरिग्रह के माध्यम से सर्वसामान्य आदमी के जीवन को आकार दिया. कई देश उसी मार्ग पर चलकर स्वतंत्र हुए हैं. स्वतंत्रता का क्या महत्व होता है यह चीन और रूस के लोगों से पूछिए.

इस स्वतंत्रता को आम आदमी की जिंदगी में पिरोने का सबसे बड़ा काम बाबासाहब ने किया. जरा सोचिए कि आम आदमी को क्या चाहिए? उसकी कामना यही होती है कि उसका देश स्वतंत्र हो और देश में हर व्यक्ति की रक्षा हो. वह खुली सांस के साथ जीवन जी सके, जीवन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो. ये सारी चीजें मिलती हैं अपने संविधान से. 

संविधान हमारे जीवन जीने के मार्ग को प्रशस्त करता है और जीवन के विकास को दिशा देता है. बाबासाहब ने ऐसे ही संविधान की रचना की और द्वेषमुक्त समाज की रचना की राह दिखाई. किसी के साथ कोई अन्याय न होने पाए..न जाति, न धर्म और न भाषा के नाम पर! उन्होंने जीवन जीने की ऐसी शैली दी है जिसमें मुक्त होकर मनुष्य खुद का विकास कर सकता है.

आज सवाल यह है कि बाबासाहब ने जिस तरह के समाज की रचना के सूत्र संविधान में पिरोए थे, देश के लिए जो सपना देखा था, वे आज भी अधूरे क्यों हैं? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार, समाज या फिर हमारी पूरी व्यवस्था? आज बाबासाहब का महापरिनिर्वाण दिवस है इसलिए पूरे देश के सामने यह सवाल फिर खड़ा है.

पिछले सप्ताह ही केंद्रीय सामाजिक न्याय तथा अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास आठवले ने राज्यसभा में बताया कि देश में अब भी सिर पर मैला ढोने के लिए मजबूर लोगों की संख्या 43797 है जिनमें 42594 अनुसूचित जाति के हैं तो मैं सिहर उठा..! 

इसमें कोई संदेह नहीं कि सिर पर मैला ढोने का अभिशाप समाप्ति की ओर है लेकिन एक आदमी भी इसके लिए मजबूर है तो यह बहुत बड़ी शर्मिदगी है, पराजय है, सामाजिक शोषण है..हमारी वैज्ञानिकता पर धब्बा है.

बाबासाहब इस बात को जानते थे कि जब तक भारत में जाति प्रथा है तब तक देश का समग्र विकास नहीं हो सकता. ..लेकिन आज भी क्या स्थिति है यह किसी से छिपा हुआ है क्या? आज भी प्रताड़ना की खबरें आती रहती हैं. हवा में जाति का विष तैर रहा है. 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के पिछले पांच-सात वर्षो का ही आप विश्लेषण करें तो पता चलता है कि दलितों पर अत्याचार के 120 से ज्यादा मामले प्रतिदिन दर्ज होते हैं. दर्ज होने वाले मामलों की संख्या इतनी है तो वास्तव में कितनी घटनाएं होती होंगी? 

आज भी दलितों को सवर्णो के कुएं से पानी लेने से रोकने और मंदिर में प्रवेश से रोकने की घटनाएं होती रहती हैं. ऐसी घटनाएं भी सामने आती रहती हैं कि दलित समाज का कोई युवक शादी के लिए घोड़े पर चढ़ा तो उस पर हमला कर दिया गया..! ऑनर किलिंग की हर साल सैकड़ों घटनाएं होती हैं. उत्तर भारत के ग्रामीण हिस्सों में तो आज भी जाति के आधार पर ही गांव बसे हुए हैं. दलितों की बस्तियां अमूमन गांव के बाहरी किनारे पर ही होती हैं.

हर राजनीतिक पार्टी बाबासाहब का नाम लेते नहीं थकती है लेकिन उनके रास्ते पर चलने का रोड मैप किसी के पास नहीं है. बाबासाहब के नाम पर राजनीति करने वाले बहुत से नेता करोड़पति और अरबपति हो गए लेकिन जिस व्यक्ति के उत्थान की बात बाबासाहब ने की थी, वह विकास की बाट जोहता रह गया! आज हम अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं लेकिन आजाद भारत के लोगों को समता मूलक समाज का अमृत नहीं पिला पाए..!

बाबासाहब के नाम पर हमने बड़ी-बड़ी संस्थाएं स्थापित कर दीं, सड़कों के नाम बाबासाहब के नाम पर रख दिए, उनके नाम पर भवनों और सभागारों का निर्माण कर दिया, सैकड़ों उद्यान बना दिए और हजारों मूर्तियां स्थापित कर दीं और मान लिया कि हमने कर्ज अदा कर दिया. ये निहायत ही गलत सोच है.! आपने कर्ज बिल्कुल अदा नहीं किया..!

जब भी मैं बाबासाहब के नाम पर बने सभागार में जाता हूं और भव्य प्रतिमा देखता हूं तो मुझे ऐसा क्यों लगता है कि यहां दम घुट रहा है..? बाबासाहब के नाम पर अस्पताल बना दिए लेकिन वहां लोग दम तोड़ते हुए क्यों नजर आते हैं? जब मैं बाबासाहब के नाम पर बने उच्च शैक्षणिक संस्थानों में जाता हूं तो मुझे वहां कागजों की स्याही क्यों गीली नजर आती है? संसद में बाबासाहब के लेकर (बाबासाहब के अनुयायियों) की आवाज धीमी क्यों आती है? 

आज भी बाबासाहब आंबेडकर हवाई अड्डे से उड़ने वाले विमानों में बैठने का सपना बहुतों को धूमिल क्यों नजर आता है? ..कितने, कहां-कहां के और किस-किस तरह के उदाहरण दूं आपको? इन आंखों ने खुलकर बहुत कुछ देखा है इसलिए मन में घुटन सी है. आखिर इस आडंबर, इस दिखावे और छल-कपट से आम आदमी कब मुक्त होगा? बाबासाहब! आपके सपनों का भारत कब बनेगा?

टॅग्स :बी आर आंबेडकरBaba Saheb
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