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ब्लॉग: वोटर को धीरे-धीरे यकीन दिला रही है कांग्रेस

By अभय कुमार दुबे | Updated: November 21, 2023 12:41 IST

उसे चार राज्यों में से तीन को तो जीतना ही होगा।  फिर उसे यह साबित करना है कि वह 2024 में 2019 का दोहराव नहीं होने देगी।  पिछली बार 2018 में कांग्रेस राज्यों का चुनाव जीत कर मुगालते में आ गई थी।  

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भारतीय राजनीति का मिजाज बहुत नाजुक है।  ऊपर से कांग्रेस के मुकाबले खड़ी भाजपा अनूठी राजनीतिक इच्छाशक्ति से संपन्न है। उसके आधार में संघ का विशाल संगठन खड़ा है जो अपनी राजनीति को समाजनीति के लहजे में करता है। इतने शक्तिशाली प्रतियोगी से कांग्रेस पहली बार मुकाबला कर रही है।  

यह बात अक्सर पूछी जाती है कि क्या कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी और उसके शक्तिशाली नेता नरेंद्र मोदी को 2024 के चुनाव में मजबूत चुनौती देने की स्थिति में है? इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस राज्यों में भाजपा को कई बार हरा देती है।  2018 में उसने राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे अहम क्षेत्रों में सरकार बनाई थी लेकिन 2019 में वह लोकसभा के मोर्चे पर इन्हीं राज्यों में बुरी तरह से पराजित हो गई।

 तभी से यह भावना बन गई है कि भाजपा और मोदी को लोकसभा में हराना कांग्रेस के बस की बात नहीं है।  क्षेत्रीय शक्तियों के भाजपा विरोधी प्रदर्शन के दम पर यह नहीं माना जा सकता कि मोदी के रथ को रोका जा सकता है।  क्षेत्रीय शक्तियां तो 2019 में भी भाजपा से आगे थीं।  

दरअसल, चुनाव तो कांग्रेस को जीतना होगा।  कांग्रेस को अपने प्रभाव-क्षेत्र में भाजपा से पचास फीसदी सीटें छीननी होंगी। अगर वह ऐसा नहीं कर पाएगी तो राज्यों में उसकी जीत राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने में उत्तरोत्तर अक्षम होती चली जाएगी। इस लिहाज से देखने पर पिछले चौदह महीने कुछ भरोसा थमाते हुए लगते हैं।

यही है वह अवधि जब कांग्रेस अपने आप को उस गर्त से उठाते हुए दिखती है जिसमें वह 2019 के चुनाव की पराजय के बाद गिर गई थी।  एक बारगी तो ऐसा लगा था कि कांग्रेस एक मरणोन्मुख पार्टी बन गई जिसका भविष्य पूरी तरह से अंधकारमय है।

कांग्रेस की यह दुर्गति भाजपा को प्रभुत्व से वर्चस्व की स्थिति की तरफ ले जाती हुई दिखने लगी थी लेकिन, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जैसे ही पिछले साल सितंबर में भारत जोड़ो यात्रा शुरू की वैसे ही इस पार्टी और उसके नेतृत्व में जीवन के चिह्न दिखाई देने लगे। दरअसल, इस प्रकरण को केवल एक यात्रा की तरह देखना उचित नहीं होगा। 

मेरे विचार से 136 दिन लंबा यह जनसंपर्क अभियान एक बहुमुखी रणनीति का पहला आयाम था।  इसका दूसरा आयाम था मल्लिकार्जुन खड़गे (संगठन) और राहुल गांधी (जनगोलबंदी) के बीच काम का कारगर बंटवारा।  इसका तीसरा आयाम था कांग्रेस द्वारा अपनी रणनीति के दो पहलुओं पर खास तौर से ध्यान देना।  इनमें पहला था अल्पसंख्यक वोटों को अपनी ओर खींचने के लिए मतदाताओं को एक नई कहानी सुनाना।  

यह काम राहुल गांधी ने यात्रा के दौरान ‘मुहब्बत की दुकान’ वाले फिकरे के जरिए बखूबी किया।  दूसरा था गैर-भाजपा विपक्ष की एकता के प्रयासों को नियोजित गतिशीलता प्रदान करना।  यह काम करने की जिम्मेदारी खड़गे और सोनिया गांधी ने निभाई।  इन दोनों ने नीतीश कुमार, शरद पवार, ममता बनर्जी और काफी-कुछ अरविंद केजरीवाल के साथ मिल कर एक ऐसे गठजोड़ को जन्म दिया जो पिछले दो लोकसभा चुनावों में नदारद था। 

इसका चौथा आयाम था कांग्रेस के सांगठनिक जीवन में उसके प्रादेशिक नेताओं (कर्नाटक में सिद्धारमैया, हिमाचल प्रदेश में सुक्खू, मप्र में कमलनाथ, छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल, तेलंगाना में रेवंत रेड्डी, राजस्थान में अशोक गहलोत के महत्व की प्रतिष्ठा।  इसका पांचवां आयाम था जातिगत जनगणना और ओबीसी राजनीति को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का आग्रह। इस पंचमुखी रणनीति को पिछले साल भर में तकरीबन एक साथ धरती पर उतारा गया है।

इसका चुनावी फोकस पिछड़ी जातियों और मुसलमान वोटरों के बीच लोकप्रिय होना है। भाजपा ने हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में चुनाव के पहले और लड़ने के दौरान कई तरह की गलतियां कीं। उसके आलाकमान ने अपनी कर्नाटक सरकार की अलोकप्रियता को समझने से इन्कार कर दिया। इसी तरह वह दोनों प्रदेशों में चल रही जबरदस्त गुटबाजी के नकारात्मक पहलुओं का शमन नहीं कर सका।  

दूसरे, प्रधानमंत्री की करिश्माई हस्ती पर हद से ज्यादा भरोसा ने भाजपा की तरफ से वे गुंजाइशें पैदा कीं, जिनमें कांग्रेस खुद को पनपा सकी।  कांग्रेस को निरंतर गरियाने, राहुल गांधी का लगातार मजाक उड़ाने और समग्र विपक्ष को खत्म कर देने के राजनीतिक मुहावरे की अति हो जाने कारण भी आम लोगों ने कांग्रेस की तरफ कुछ-कुछ हमदर्दी से देखना शुरू किया। 

इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि कांग्रेस की इस कहानी का अंत अगले साल उसके सत्तारूढ़ होने में निकलने वाला है। अभी तो कांग्रेस केवल स्वयं को भाजपा की टक्कर के लिए तैयार करने की स्थिति में आ पाई है. उसे बहुत कुछ साबित करना है। उसे राज्यों के चुनावों में प्रभावी जीत हासिल करनी है।  

उसे चार राज्यों में से तीन को तो जीतना ही होगा।  फिर उसे यह साबित करना है कि वह 2024 में 2019 का दोहराव नहीं होने देगी।  पिछली बार 2018 में कांग्रेस राज्यों का चुनाव जीत कर मुगालते में आ गई थी।  सर्वाधिक महत्वपूर्ण तो यह है कि कांग्रेस को अपना प्रदर्शन सुधारने के साथ-साथ गठजोड़ राजनीति के बेहतरीन रणनीतिकार के रूप में उभरना होगा। 

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