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ब्लॉग: सियासी मैदान में उतरते सिनेमा के सितारे

By उमेश चतुर्वेदी | Updated: April 3, 2024 11:41 IST

लोकतांत्रिक समाज में चुनावी मैदान को पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए ही सीमित करना संभव नहीं है लेकिन यह सवाल जरूर उठता रहा है कि सियासी मैदान में फिल्मी सितारों का उतरना कितना जायज है?

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ठळक मुद्देभाजपा ने कंगना रनौत को चुनावी मैदान में क्या उतारा, राजनीति में फिल्मी सितारों की चर्चा तेज हो गईवैसे कंगना कोई पहली स्टार नहीं हैं, जिन्हें किसी पार्टी ने सियासी मैदान में उतारा गया हैफिल्मों से सियासत में आने वाले दिग्गजों में करुणानीधि, एमजीआर और जयललिता जैसी कई हस्तियां हैं

भाजपा ने कंगना रनौत को हिमाचल की मंडी सीट से चुनावी मैदान में क्या उतारा, राजनीति में फिल्मी सितारों की मौजूदगी को लेकर चर्चा तेज हो गई। वैसे कंगना कोई पहली स्टार नहीं हैं, जिन्हें किसी पार्टी ने सियासी मैदान में उतारा है।

इसके पहले भी सियासी मैदान में फिल्मी स्टार उतरते रहे हैं। लोकतांत्रिक समाज में चुनावी मैदान को पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए ही सीमित करना संभव नहीं है लेकिन यह सवाल जरूर उठता रहा है कि सियासी मैदान में फिल्मी सितारों का उतरना कितना जायज है? यह सवाल उठने की वजह है, उनकी जमीनी स्तर पर राजनीति में कम सक्रियता।

चाहे कोई पूर्णकालिक राजनेता हो या फिर फिल्मी सितारा, अगर वह एक बार चुनाव जीत जाता है तो वह अपने चुनाव क्षेत्र की जनता-जनार्दन का संसद में प्रतिनिधि हो जाता है। इस नाते उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने संसदीय क्षेत्र की जनता के विकास और भलाई के लिए काम करे, संसद समेत दूसरे मंचों पर वह उनकी आवाज बने। देश के राजनीतिक आसमान पर फिल्मी दुनिया से आए सितारों के छा जाने की प्रक्रिया का विश्लेषण करें तो दो तरह की प्रवृत्तियां सामने आती हैं।

दक्षिण भारतीय राजनीति में फिल्मी दुनिया से आए सितारों ने जमीनी स्तर पर भी बखूबी प्रभावित किया। तमिलनाडु के दोनों प्रमुख दलों की मुखिया रही शख्सियतें इसका उदाहरण हैं। राज्य की सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कषगम के प्रमुख रहे एम. करुणानिधि तमिल फिल्मों के पटकथाकार रहे लेकिन राजनीति में जब वे आए तो तमिल राजनीति का ऐसा चेहरा बन गए, जिनके बिना तमिलनाडु की राजनीति की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

ऐसी ही स्थिति अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम के प्रमुख रहे एम. जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता की भी रही। एमजी रामचंद्रन तमिल फिल्मों के सुपरस्टार रहे, कुछ ऐसी ही स्थिति जयललिता की भी रही लेकिन एक बार राजनीति में आने के बाद यह जोड़ी भी राजनीति की ही होकर रह गई। दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश की राजनीति में ऐसा ही नाम नंदमूरि तारक रामाराव रहे।

इस लिहाज से उत्तर भारतीय राजनीति में सिनेमाई हस्तियों को देखते हैं तो हालात अलग नजर आते हैं। मुंबइया सिनेमा के हीरो की सिनेमाई पर्दे पर लार्जर दैन लाइफ छवि रही, लेकिन राजनीति की पथरीली जमीन पर उनकी यह छवि पस्त पड़ती रही। सियासत की दुनिया में सिनेमाई सितारों की फेहरिस्त लंबी है।

पार्टी चाहे जो भी हो, लेकिन दक्षिण को छोड़ दें तो ज्यादातर सितारों का चयन इसलिए नहीं हुआ कि वे राजनीतिक भूमिका निभा पाएंगे, बल्कि उन्हें जिताऊ चेहरे के तौर पर मौका मिला। उनमें से कुछ ही जमीनी स्तर पर राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर पाए।

सिनेमा के सुनहले पर्दे पर बहादुरी दिखाने वाले इन सितारों के लिए राजनीति की पथरीली जमीन पर पांव जमाए रख पाना संभव नहीं रहा। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर लोकतंत्र की दुनिया में चमक ज्यादा अहमियत रखती है या लोक के प्रति जवाबदेही। राजनीति को संजीदगी से इस दिशा में भी सोचना होगा।

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