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Assembly Elections 2023: राजस्थान, मप्र और छत्तीसगढ़ में हार, पराजय के बाद अब क्या करेगी कांग्रेस?

By अभय कुमार दुबे | Updated: December 7, 2023 11:39 IST

Assembly Elections 2023: कांग्रेस ने तेलंगाना चुनाव जीता और अच्छी तरह से जीता. लेकिन उसके साथ हिंदी पट्टी के राज्यों के न होने से इस जीत का कोई राष्ट्रीय महत्व नहीं बना. 

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ठळक मुद्देनतीजों ने विपक्षी एकता करने की उसकी दावेदारियों को भी झटका लगा दिया.क्षेत्रीय शक्तियों से इंडिया गठबंधन के भीतर अपनी शर्तें नहीं मनवा पाएगी. विपक्षी गठबंधन की तरफ आकर्षित नहीं कर पाएगी जो इस चुनाव को टकटकी लगा कर देख रही थीं.

Assembly Elections 2023:  सवाल यह है कि कांग्रेस अब क्या करेगी? क्या इस पराजय में उसके लिए कोई कारगर सबक है? मुझे लगता है कि कांग्रेस का नेतृत्व (राहुल, प्रियंका, सोनिया और खड़गे) अगर चाहे तो इस नतीजों की रोशनी में अपने तेजी से पुराने होते जा रहे क्षेत्रीय नेतृत्व से पिंड छुड़ा सकता है.

यह नेतृत्व राहुल गांधी के सुझावों को तिरस्कार से देखता है. यह एक ऐसी हकीकत है जिसके बारे में कभी ठीक से चर्चा नहीं हुई है. लेकिन, इन चुनावों से इसकी मिसाल निकलती है. कांग्रेस ने तेलंगाना चुनाव जीता और अच्छी तरह से जीता. लेकिन उसके साथ हिंदी पट्टी के राज्यों के न होने से इस जीत का कोई राष्ट्रीय महत्व नहीं बना.

नतीजों ने विपक्षी एकता करने की उसकी दावेदारियों को भी झटका लगा दिया. अब वह क्षेत्रीय शक्तियों से इंडिया गठबंधन के भीतर अपनी शर्तें नहीं मनवा पाएगी. कांग्रेस के खराब प्रदर्शन का एक परिणाम तो यह होगा कि वह उन पार्टियों को विपक्षी गठबंधन की तरफ आकर्षित नहीं कर पाएगी जो इस चुनाव को टकटकी लगा कर देख रही थीं.

इसका एक उदाहरण बहुजन समाज पार्टी है. अगर कांग्रेस जीतती तो मायावती एक बार सोच भी सकती थीं कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके उप्र में भाजपा को सफलतापूर्वक चुनौती दी जा सकती है. लेकिन अब वे उस गठजोड़ में क्यों शामिल होना चाहेंगी जिसकी 2024 में जीतने की संभावनाएं बहुत कम हैं.

कांग्रेस के लिए एक घातक संदेश यह भी गया कि यह पार्टी तो केवल दक्षिण भारत तक ही सीमित रह गई है. उत्तर भारत में उसके पास केवल हिमाचल प्रदेश जैसा छोटा सा राज्य ही रह गया है. वहां भी कांग्रेस का प्रभुत्व नेहरू के जमाने जैसा नहीं है. आंध्र में उसे तेलुगुदेशम और वाईएसआर रेड्डी कांग्रेस से निबटना है.

तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियां हैं और कांग्रेस केवल उनमें से एक की पिछलग्गू ही हो सकती है. इस तरह दक्षिण में भी वह केवल केरल, कर्नाटक और तेलंगाना की पार्टी ही है. कांग्रेस और उसके साथ हमदर्दी रखने वाले कह रहे थे कि पार्टी अपने क्षत्रपों पर भरोसा कर रही है.

यानी, वह भाजपा की तरह आलाकमान द्वारा संचालित मुहिम न चला कर उन चेहरों के नेतृत्व में काम कर रही है जिन्हें जीत के बाद प्रदेश की कमान सौंपी जानी है. एक तरह से इसे नेहरू युग की विरासत को पुन: जिंदा करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा था जब कांग्रेस अपने क्षेत्रीय नेताओं के आधार पर खड़ी रहती थी.

आलाकमान इन नेताओं के राजनीतिक प्रभाव के योगफल की नुमाइंदगी करता था. कांग्रेस को कहीं न कहीं यह भी यकीन था कि उसके पास एक नैरेटिव भी है जिसे वह इन चुनाव में आजमाएगी. इस नैरेटिव के शीर्ष पर जातिगत जनगणना थी, और मोदी-अदानी के जोड़े से निकलने वाले क्रोनी कैपिटलिज्म की आलोचना थी.

मप्र का चुनाव पूरी तरह से कमलनाथ के हाथों में था, और उन्होंने पूरे चुनाव में आलाकमान के किसी भी सुझाव को नहीं माना. यहां तक कि आलाकमान द्वारा भेजे गए पर्यवेक्षकों का जमकर तिरस्कार किया. एआईसीसी ने पहले मुकुल वासनिक को भेजा, लेकिन कमलनाथ ने उन्हें कोई लिफ्ट नहीं दी. उन्होंने खुद आलाकमान से प्रार्थना करके अपने आप को वहां से हटवा लिया.

फिर जयप्रकाश अग्रवाल को भेजा गया. उनका भी यही हश्र हुआ. उसके बाद रणदीप सुरजेवाला भेजे गए. भोपाल में रहकर उनका काम केवल इतना था कि वे कमलनाथ के फैसलों पर मुहर लगाते रहते थे. कमलनाथ ने राहुल गांधी द्वारा भेजे गए चुनाव प्रबंधक सुनील कानोगुलू की सेवाएं लेने से भी इनकार कर दिया.

इसी तरह राहुल गांधी की बात अशोक गहलोत ने भी नहीं मानी. राहुल की समझ यह थी कि पुराने विधायकों के टिकट काट दिए जाने चाहिए, क्योंकि उनके  खिलाफ जबरदस्त किस्म की स्थानीय एंटीइनकम्बेंसी है. पर गहलोत ने इसका उल्टा किया. वे उन अलोकप्रिय विधायकों के कृतज्ञ थे क्योंकि उन्होंने सचिन पायलट की बगावत के खिलाफ उनका साथ देकर सरकार बचाई थी.

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने भी चुनावी रणनीति के बारे में आलाकमान की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया. आलाकमान चाहता था कि विभिन्न समुदायों की चुनावी गोलबंदी पर अलग-अलग जोर दिया जाए. बघेल की समझ यह थी कि उनकी योजनाएं चुनाव जीतने के लिए काफी हैं.

इसी तरह बघेल ने अपनी सरकार के खिलाफ एंटीइनकम्बेंसी को छिपाने की भरसक और सफल कोशिश भी की. कुल मिला कर कांग्रेस का सबक यह है कि स्थानीय ताकतों को बढ़ावा जरूर दिया जाना चाहिए लेकिन आलाकमान की कड़ी निगरानी और निर्देशन में.

कायदे से हर राज्य में जातिगत जनगणना का एजेंडा कार्यकर्ताओं की जुबान पर होना चाहिए था. लेकिन कार्यकर्ताओं ने शायद ही इसका जिक्र किया हो.  व्यावहारिक रूप से देखें तो इन चुनावों में आलाकमान अपने क्षेत्रीय नेताओं का मातहत बना रहा.

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