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आकाश से टूटकर बिखरा एक अधूरा सपना! 

By राजेंद्र दर्डा | Updated: January 29, 2026 09:47 IST

Ajit Pawar Plane Crash: दृढ़ संकल्प, अपार ऊर्जा और महत्वाकांक्षाओं से परिपूर्ण जीवन का इस तरह असमय अंत मन को गहराई तक विचलित कर देता है.

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ठळक मुद्देमहत्वपूर्ण विषयों पर उनके साथ बैठकों में भाग लेने का अवसर भी मिला.अजित दादा सीधे बैठक के एजेंडे पर बात करते थे.इस कार्यशैली का मुझे भी बहुत लाभ मिला.

Ajit Pawar Plane Crash: आकाश जितनी विराट उपलब्धियों की क्षमता रखने वाले वरिष्ठ नेताओं की जीवन-यात्रा के यूं अचानक थम जाने में नियति का कौन-सा संकेत है, वही जाने! संजय गांधी, आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई. एस. राजशेखर रेड्डी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माधवराव सिंधिया और अब अजित पवार. अजित दादा के आकस्मिक निधन का समाचार अत्यंत हृदय विदारक है. दृढ़ संकल्प, अपार ऊर्जा और महत्वाकांक्षाओं से परिपूर्ण जीवन का इस तरह असमय अंत मन को गहराई तक विचलित कर देता है.

राज्य की अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था की गहरी समझ रखने वाले अजित पवार अनेक कारणों से मेरी स्मृतियों में बने रहेंगे. 1999 से 2014 के दौरान जब मैं विधायक और विभिन्न विभागों का मंत्री था, तब कई बार उनसे संपर्क हुआ और महत्वपूर्ण विषयों पर उनके साथ बैठकों में भाग लेने का अवसर भी मिला.

हर मुलाकात के साथ जनकल्याण के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता देखकर उनकी छवि मेरे मन में और भी प्रखर होती चली गई. कई बार मेरे विभागों से संबंधित बैठकों की अध्यक्षता उन्होंने उपमुख्यमंत्री/वित्त मंत्री के रूप में की. वह अनुभव मेरे लिए विशेष रूप से स्मरणीय है. अजित दादा सीधे बैठक के एजेंडे पर बात करते थे.

लंबी भूमिका बनाने के बजाय वे मुद्दों पर चर्चा करते और एक-एक समस्या का समाधान निकालते थे. वे विशेष जोर देते थे कि बैठक से कम समय में अधिकतम ठोस निर्णय निकलें. वे तत्काल निर्णय लेते और पंद्रह-बीस मिनट में ही बैठक समाप्त कर देते थे. अनावश्यक विस्तार या विलंब करना उनका स्वभाव नहीं था. उनकी इस कार्यशैली का मुझे भी बहुत लाभ मिला.

उन्होंने वित्त विभाग सहित कई विभागों की जिम्मेदारी संभाली. अन्य विभागों की भी उन्हें गहरी समझ थी. कोई भी अधिकारी या जन-प्रतिनिधि गलत जानकारी देकर उन्हें भ्रमित नहीं कर सकता था. यदि कोई ऐसा करने का साहस करता तो वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करके संबंधित व्यक्ति को तुरंत सच का एहसास करा देते थे.

वे साफ कहा करते थे, “यदि कोई काम संभव न हो, तो सामने वाले को साफ-साफ ‘नहीं’ कह देना चाहिए. टालते रहना मेरे स्वभाव में नहीं है.” लेकिन साथ ही, यदि वे किसी को कोई वादा कर देते तो उसे अवश्य निभाते थे. सबकुछ जानने का दिखावा उन्होंने कभी नहीं किया. वे सामने वाले की बात ध्यान से सुनते-समझते थे.

लंबे समय तक कठोर और दबदबे वाले नेता के रूप में पहचाने जाने के बाद, उन्होंने हाल के वर्षों में अपने व्यक्तित्व और स्वभाव में परिवर्तन किया था. वे हंसमुख और विनोदप्रिय हो गए थे. अपने भाषणों में हल्के-फुल्के हास्य का समावेश कर लोगों के दिलों को छू लेते थे. उनके व्यक्तित्व का यह परिवर्तन सचमुच आश्चर्यचकित करने वाला था.

उनके इस बदले हुए रूप ने जहां लोगों को बेहद सुखद अनुभूति कराई वहीं राजनेताओं को प्रेरणा भी दी. जब मैं राज्य का शिक्षा मंत्री था और कुछ साहसिक निर्णय ले रहा था, उस समय वे उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री थे. ऐसा ही एक निर्णय था स्कूलों के नामांकन सत्यापन का. मेरे इस निर्णय से शिक्षण संस्थाएं चलाने वाले कुछ राजनीतिक नेता परेशान हो गए थे.

उन्हें लगा कि सरकार के इस निर्णय से उनकी संस्थाओं पर आंच आएगी. लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और उपमुख्यमंत्री अजित दादा के सकारात्मक सहयोग के कारण इस निर्णय को लागू करने के लिए मुझे आवश्यक समर्थन और बल मिला. जब मैं शिक्षा मंत्री के रूप में स्कूलों, विद्यार्थियों और शिक्षकों के हित में निर्णय लेता था, तब भी हर बार दादा मुझे सहयोग करते थे.

वे कहा करते थे, “तुम्हारा उद्देश्य अच्छा है, आगे बढ़कर निर्णय लो.” स्कूलों के गैर-शिक्षकीय अनुदान लगभग 15 वर्षों से लंबित थे. इसके कारण कई स्कूलों के लिए अपनी दैनिक आवश्यकताएं पूरी करना कठिन हो गया था. उस लंबित अनुदान को जारी करने के लिए कुल 203 करोड़ रुपए की आवश्यकता थी. मैं वित्त मंत्री अजित दादा के पास गया और उन्हें बताया कि यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है.

उन्होंने तत्काल वह अनुदान स्वीकृत कर दिया, जिससे सैकड़ों स्कूलों को बड़ी राहत मिली. ऐसा ही  सकारात्मक अनुभव मुझे उद्योग विभाग की समस्याएं सुलझाते समय भी हुआ. निरंतर काम करते रहने की एक अद्भुत और लगभग अकल्पनीय ऊर्जा ही अजित दादा के व्यक्तित्व की विशेष पहचान थी.

छत्रपति संभाजीनगर (तत्कालीन औरंगाबाद) में शाहनूर मियां दरगाह के समीप स्थित संग्रामनगर फ्लायओवर का उद्घाटन उन्होंने रात साढ़े दस बजे किया था. उस समय मैंने उनके जिस स्फूर्तिवान, प्रसन्न और ऊर्जावान व्यक्तित्व की झलक देखी, वह आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा है. उनके काम करने की गति सचमुच विस्मित कर देने वाली थी.

सामान्य धारणा यह रहती है कि मंत्री पद मिलते ही अनेक नेता कभी-कभार ही मंत्रालय में दिखाई देते हैं, लेकिन अजित दादा को मैंने प्रतिदिन सुबह नौ बजे से पहले ही अपने कक्ष में काम में तल्लीन देखा. कार्य के प्रति उनका अनुशासन और समर्पण असाधारण था. सदैव आगे बढ़ने की चाह रखने वाला, समय से आगे देखने की अद्भुत दृष्टि रखने वाला, अपने लक्ष्य के लिए निरंतर संघर्षरत रहने वाला महाराष्ट्र का यह बुलंद नेता... अब हमारे बीच नहीं होगा. यह अपूरणीय क्षति है.

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