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भूखी, लार टपकाती हुई नज़रों के खिलाफ क्या कोई कानून बनाया जा सकता है?

By राहुल मिश्रा | Updated: May 24, 2018 10:25 IST

चलिए सड़क पर किसी लड़की के साथ चल कर देखिए! सड़क किनारे खड़े कई लोग आँखों से बलात्कार करते नज़र आयेंगे.

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बलात्कार पर कोई भी बहस करने से पहले क्या किसी ने जाना है कि इसका अर्थ क्या होता है। मैंने जानने की कोशिश की, कि आखिर बलात्कार का अर्थ क्या है!

विकिपीडिया कहता है :

किसी व्यक्ति (चाहे वे किसी भी उम्र के हों) की पूरी मर्ज़ी के बिना अगर उनके साथ संभोग किया जाए तो इसे बलात्कार (रेप) कहते हैं। लेकिन मैं कभी इस बात से सहमत नहीं रहा, इसकी वजह में आगे बता रहा हूँ-

बलात्कार का मतलब केवल सम्भोग करना ही नहीं है बल्कि वो हर काम है जो किसी लड़की की मर्ज़ी जाने बिना या उसकी मर्ज़ी के खिलाफ किया जाए, सिर्फ तन का भक्षण करना ही नहीं बल्कि मन का भक्षण भी बलात्कार है। जब तक एक लड़की इस दुनिया को समझ पाने के लायक बनती है तब तक उसके साथ कई-कई बार बलात्कार हो चुका होता है। बलात्कार उसके सपनों का, उसकी इच्छाओं का, उसके अरमानों का! हम काँटों के झाड़ को दोष दे रहे हैं, उसको ख़त्म करने की बात कर रहे हैं, लेकिन क्या आपको नहीं लगता इस झाड़ के फैलने से पहले ही उसे काट दें।

ऐसा पाखंडी है ये तत्वहीन समाज, एक तरफ औरत को जननी कह कर पूजता है और एक तरफ, उसके जननांग से अपनी कभी न ख़त्म होने वाली भूख मिटाने को आतुर रहता है। इसके बाद एक बार किसी लड़की का बलात्कार हो जाये तो उसके बाद भी बलात्कार सभी करते हैं, हमारा समाज करता है! फर्क इतना है कि उस दिन उसके शरीर के साथ हुआ और ऐसे आये दिन उसके वजूद, उसके अस्तित्व के साथ ये पूरा समाज बलात्कार करता है।

आपको क्या लगता है कि निर्भया या कठुआ या ऐसे ही अन्य मामलों के अपराधी कहीं आसमान से टपके हैं, जो हम सब पूरा झंडा ऊंचा करके उनकी फांसी की मांग करने में लग गए! वो यहीं से हैं आपके और हमारे आस पास, कहीं न कहीं हमारे अंदर!

चलिए सड़क पर किसी लड़की के साथ चल कर देखिए! सड़क किनारे खड़े कई लोग आँखों से बलात्कार करते नज़र आयेंगे। उन भूखी, लार टपकाती हुई नज़रों के खिलाफ क्या कोई कानून बनाया जा सकता है? उन्हीं 100 घूरते लोगों में से 1 किसी दिन इतना गिर जाता है जो ऐसा कुकृत्य करता है। लेकिन मेरे हिसाब से दोषी वो 1 नहीं पूरे 100 हैं। सब के सब बलात्कारी हैं, मानसिक बलात्कारी। जो बार बार एक लड़की के वजूद पर चोट करते हैं। उस लड़की को सड़क पर नज़र झुका कर चलने पर मजबूर करते हैं जैसे उसने घर से निकल कर कोई गुनाह कर दिया है।

मेरी नजर में बलात्कार वो शब्द है जो एक स्त्री के ना सिर्फ शरीर को बल्कि उसकी आत्मा, उसके आत्म- सम्मान, उसके अस्तित्व तक को छलनी कर देता है। यह एक ऐसी अमानवीय घटना है जो एक हंसती- खेलती जिन्दगी को अंधकार की खाई में धकेल देती है। कभी कुछ समय के लिए यह समाज उसकी हालत पर तरस खाने का दिल चाहे तो उसके दुख पर एक-आध आंसू बहाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेता है और फिर भूल जाता है कि कल क्या हुआ था?

टॅग्स :रेपदिल्ली गैंगरेपकठुआ गैंगरेपनिर्भया गैंगरेप
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