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मिखाइल गोर्बाचेव: सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति जिन्हें शीत युद्ध समाप्त करने वाले नेता के रूप में याद रखा जाएगा

By शिवेंद्र राय | Updated: August 31, 2022 11:53 IST

मिखाइल गोर्बाचेव की प्रगतिशील और सुधारवादी नीतियों को ही सोवियत संघ के पतन का जिम्मेदार भी माना गया। साल 1985 में गोर्बाचेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने तब उन्होंने सोवियत संघ के दरवाजे दुनिया के लिए खोल दिए और बड़े स्तर पर कई सुधार किए।

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ठळक मुद्देनहीं रहे सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेवगोर्बाचेव को वर्ष 1990 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया1985 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति चुने गए थे मिखाइल गोर्बाचेव

नई दिल्ली: सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव नहीं रहे। लंबे समय से बीमार चल रहे पूर्व सोवियत संघ के आखिरी नेता ने 91 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। गोर्बाचेव सोवियत संघ के सबसे चर्चित नेताओं में से थे। 1985 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति चुने गए मिखाइल गोर्बाचेव को सुधारवादी नेता के रूप में जाना जाता है। गोर्बाचेव की सोच सोवियत रूस के परंपरागत वामपंथी नेताओं से अलग थी। इसके कारण उन्हें अपनी ही पार्टी का विरोध भी झेलना पड़ा। मिखाइल गोर्बाचेव पर अमेरिका का एजेंट होने के भी आरोप लगे।

मिखाइल गोर्बाचेव की आंखों के सामने बिखरा सोवियत संघ

91 साल की उम्र में आखिरी सांस लेने वाले मिखाइल गोर्बाचेव और सोवियत रूस का नाम साथ-साथ लिया जाता है। मिखाइल गोर्बाचेव को हमेशा उस नेता के रूप में याद किया जाएगा जिन्होंने बिना किसी खून खराबे के शीत युद्ध समाप्त कराया लेकिन साथ ही गोर्बाचेव को उस नेता के रूप में भी याद किया जाता है जिनकी आंखो के सामने देखते ही देखते वैश्विक महाशक्ति कहा जाने वाला सोवियत संघ टूटकर बिखर गया। 

2 मार्च 1931 को जन्मे मिखाइल गोर्बाचेव ने मास्को में कानून की पढ़ाई की थी। स्टालिन के शासनकाल में बड़े हुए गोर्बाचेव ने द्वितीय विश्व युद्ध की त्रासदी को अपनी आंखो के सामने देखा था। गोर्बाचेव ने कानून की पढ़ाई के बाद कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली लेकिन उनके विचार बाकी नेताओं से अलग थे।  गोर्बाचेव ने साम्यवाद में सुधार की मांग की।

1985 में सोवियत संघ का राष्ट्रपति चुने जाने के बाद खोला सुधारों का रास्ता

साम्यवाद में सुधार के बड़े पैरोकार मिखाइल गोर्बाचेव ने ग्लासनोस्त यानी खुलेपन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पेरेस्त्रोइका यानी परिवर्तन और पुनर्गठन की अवधारणाओं को पेश किया। जब साल 1985 में गोर्बाचेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने तब उन्होंने सोवियत संघ के दरवाजे दुनिया के लिए खोल दिए और बड़े स्तर पर कई सुधार किए। ग्लासनोस्त  की नीति के बाद सोवियत संघ में लोगों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार मिला। तब के सोवियत रूस के लिए ये एक बड़ी बात थी। गोर्बाचेव की ये नीति उनकी अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं को नागवार गुजरी और साल 1991 में उनका तख्ता पलटने की कोशिश भी की गई। अपने विचारों के लिए गोर्बाचेव को अमेरिका का एजेंट तक कहा गया।

मिखाइल गोर्बाचेव की प्रगतिशील और सुधारवादी नीतियों को ही सोवियत संघ के पतन का जिम्मेदार भी माना गया। गोर्बाचेव सोवियत संघ के राज्यों को एक रखने की कोशिश आखिरी दम तक करते रहे लेकिन आखिरकार उन्हें 25 दिसंबर, 1991 को सोवियत संघ के राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देना पड़ा। यही वह दिन था जब क्रेमलिन में सोवियत झंडे को आखिरी बार झुकाया गया। इसके बाद ही आधुनिक रूस का जन्म हुआ। 

मिखाइल गोर्बाचेव को 1990 में मिला नोबेल शांति पुरस्कार

मिखाइल गोर्बाचेव को शीत युद्ध समाप्त करने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है। अमेरिका-ब्रिटेन सहित पश्चिमी देशों और सोवियत संघ के बीच तनाव की स्थिति में भी गोर्बाचेव ने ऐसी परिस्थितियां बनाई जिससे 1991 में शीत युद्ध का अंत हो गया। मिखाइल गोर्बाचेव ने अमेरिका के साथ हथियार नियंत्रण करने वाले सौदा किया। उनके शासनकाल में क्षेत्रीय टकराव भी कम हुए। गोर्बाचेव के शासनकाल में पूरब और पश्चिम के बीच संबंधों में नाटकीय परिवर्तन हुए।  टकराव की जगह बातचीत ने ले ली। पश्चिम के साथ संबंधों में बड़े बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाने के लिए गोर्बाचेव को वर्ष 1990 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया। 

साल 1991 मे राष्ट्रपति पद से इस्तीफा और सोवियत संघ के पतन के बाद गोर्बाचेव ने 1996 में एक बार फिर से रूस की राजनीति में आने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। उस समय राष्ट्रपति चुनावों में उन्हें सिर्फ 0.5 फ़ीसदी मत मिले थे।

वैश्विक राजनीति के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक गिने जाने वाले मिखाइल गोर्बाचेव अब हमारे बीच नहीं हैं। गोर्बाचेव का अंतिम संस्कार मॉस्को में होगा। रूसी समाचार एजेंसी तास के अनुसार उन्हें नोवोदिवेची सेमेट्री में उनकी पत्नी राइसा की कब्र के पास ही दफ़न किया जाएगा जिनका 1999 में निधन हो गया था। रूस के कई बड़े नेताओं को इसी कब्रिस्तान में दफनाया गया है।

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