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रामकृष्ण परमहंस जयंती विशेष: जब रामकृष्ण ने कर दी थी मां काली के टुकड़े

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: February 18, 2018 09:28 IST

काली के वे इतने बड़े भक्त थे कि भक्ति के लिए रामकृष्ण किसी हद तक जा सकते थे। लेकिन एक वाकया ने उन्हें काली के टुकड़े करने पर मजूबर कर दिया।

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देश में कई ऐसे संत और महान व्यक्ति हुए है जिन्हें उनके कर्म, ज्ञान और महानता के लिए आज भी याद किया जाता है। इनमें से एक थे रामकृष्ण परमहंस। जिन्हें दुनिया एक महान संत, गुरु व विचारक के रुप में जानती है। 18 फरवरी को देश स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की जयंती मनाती है। रामकृष्ण परमहंस का जन्म पश्चिमी बंगाल के हुगली जिले में कामारपुकुर नाम के गांव के एक दीन और धर्मनिष्ठ परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम गदाधर था। 7 साल की आयु में गदाधर के पिता की मृत्यु हो गई। इनके बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय में एक पाठशाला के संचालक थे। इसके बाद उनके बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय उन्हें कलकत्ता लेकर चले गए। कहा जाता है कि रामकृष्ण परमहंस मां काली के बहुत बड़े भक्त थे।  

साल 1855 में रामकृष्ण जी के बड़े भाई रामकुमार को दक्षिणेश्वर काली मंदिर के मुख्य पुजारी के रुप में नियुक्त किया गया। 23 साल की उम्र में उनका विवाह शारदामनि के साथ हुआ। ये मां काली के बहुत बडे़ भक्त थे। वो मां काली के इतने बड़े भक्त थे कि उन्हें सब पागल समझते थे।   

काली के भक्त थे रामकृष्ण 

जैसा कि रामकृष्ण परमहंस काली के भक्त थे। कहा जाता था कि उनके लिए काली कोई देवी नहीं एक हकीकत थी। मां काली के भक्ति में इतना लीन थे कि काली उनके सामने नृत्य करतीं थी, उनके हाथों से खाती थी, उनके बुलाने पर आती थी। इतना ही नहीं रामकृष्ण की चेतना इतनी ठोस थी कि वज जिस रूप की इच्छा करते थे वह उनके लिए एक सच बन जाती थी। इससे जुड़ी एक कहानी काफी प्रचलित है। 

जब काली के टुकड़े कर दिए!

काली के वे इतने बड़े भक्त थे कि भक्ति के लिए रामकृष्ण किसी हद तक जा सकते थे। लेकिन एक वाकया ने उन्हें काली की मूर्ति तोड़ने पर मजूबर कर दिया। कहानी कुछ इस तरह है कि  एक दिन रामकृष्ण हुगली नदी के तट पर बैठे थे। उसी वक्त योगी तोतापुरी उसी रास्ते से निकले। तोतापुरी ने देखा कि रामकृष्ण में इतनी संभावना है कि वे एक ज्ञानी पुरुष बन जाते हैं। मगर समस्या यह थी कि वह सिर्फ अपनी भक्ति में डूबे हुए थे।

तोतापुरी रामकृष्ण के पास आए और उन्हें समझाने की कोशिश कि आप क्यों सिर्फ अपनी भक्ति में ही इतने लीन हैं? आपके अंदर इतनी क्षमता है कि किसी भी चरम को छू सकते हैं।  रामकृष्ण बोले, 'मैं सिर्फ काली को चाहता हूं, बस।' वह एक बच्चे की तरह थे जो सिर्फ अपनी मां को चाहता था। मां काली के इतने बड़े भक्त थे कि कभी वो नाचने लगते थे तो कभी वो तेज सुर में गाने लगते थे। इस वजह से उन्हें लोग पागल भी समझते थे। तोतापुरी ने कई तरीके से उन्हें समझाने की कोशिश की मगर रामकृष्ण समझने के लिए तैयार नहीं थे।

तोतापुरी ने देखा कि रामकृष्ण अपनी भक्ति में लगे हुए हैं। मौका पाकर तोतापुरी ने रामकृष्ण से कहा कि मां काली की भक्ति से आप अपनी भावनाओं को शक्तिशाली बना रहे हैं, अपने शरीर को समर्थ बना रहे हैं, अपने भीतर के रसायन को शक्तिशाली बना रहे हैं। लेकिन आप अपनी जागरूकता को शक्ति नहीं दे रहे। आपके पास जरूरी ऊर्जा है मगर आपको सिर्फ अपनी जागरूकता को सक्षम बनाना है।

तोतापुरी के इस बात को मान लिया और बोले कि आज के बाद  मैं अपनी जागरूकता को और शक्तिशाली बनाऊंगा और अपनी पूरी जागरूकता में बैठूंगा। मगर जिस पल उन्हें काली के दर्शन होते, वह फिर से प्रेम और परमानंद की बेकाबू अवस्था में पहुंच जाते।

फिर तोतापुरी बोले कि अगली बार जब भी काली दिखें, आपको एक तलवार लेकर उनके टुकड़े करने हैं। रामकृष्ण ने पूछा, 'मुझे तलवार कहां से मिलेगी?' तोतापुरी ने जवाब दिया, 'वहीं से, जहां से आप काली को लाते हैं। अगर आप एक पूरी काली बनाने में समर्थ हैं, तो आप तलवार क्यों नहीं बना सकते? आप ऐसा कर सकते हैं। अगर आप एक देवी बना सकते हैं, तो उसे काटने के लिए एक तलवार क्यों नहीं बना सकते? 

उसी समय, रामकृष्ण ने अपनी कल्पना में तलवार बनाई और काली के टुकड़े कर दिए, इस तरह वह मां और मां से मिलने वाले परमानंद से मुक्त हो गए। अब वह वास्तव में एक परमहंस और पूर्ण ज्ञानी बन गए।

टॅग्स :पूजा पाठस्वामी विवेकानंदहिंदू धर्म
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