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पांच राज्य में विधानसभा चुनावः किसान आंदोलन होगा बेअसर, हावी रहेंगे स्थानीय मुद्दे!

By नितिन अग्रवाल | Updated: March 2, 2021 15:06 IST

चार राज्यों तमिलनाडु, असम, केरल और पश्चिम बंगाल में विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मई और जून में समाप्त हो रहा है.

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ठळक मुद्देतमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक एवं भाजपा ने छह अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सीट बंटवारे पर वार्ता शुरू कर दी.विजयकांत की पार्टी देसिया मुरपोक्कू द्रविड कड़गम (डीएमडीके) और जीके वासन की तमिल मनीला कांग्रेस भी अन्नाद्रमुक की सहयोगी हैं.भाजपा के एक केंद्रीय पदाधिकारी के अनुसार हर राज्य में किसानों की परिस्थितियां और मुद्दे अलग- अलग हैं.

नई दिल्लीः 1 मार्च तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर चल रहा किसान आंदोलन भले ही दिल्ली की सीमाओं से बढ़कर देशभर में फैल रहा है.

ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि इस बीच हो रहे पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव में क्या ये मुद्दा बनेगा. चुनावी राज्यों के माहौल को देखते हुए सियासत के जानकारों का मानना है कि इन चुनावों में स्थानीय मुद्दे ही हावी रहेंगे. भाजपा के एक केंद्रीय पदाधिकारी के अनुसार हर राज्य में किसानों की परिस्थितियां और मुद्दे अलग- अलग हैं.

लिहाजा इस कृषि कानूनों को लेकर उनकी राय भी एक जैसी नहीं है. केवल पंजाब, हरियाणा के गिने चुने बड़े किसानों को ही नुकसान का डर है. लेकिन विपक्षी दलों ने बहुत अपने फायदे के लिए किसानों के बीच भ्रम फैलाया है जिसका चुनाव पर कोई खास असर नहीं होगा.

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुदेश वर्मा ने कहा कि केवल चुनावी राज्यों ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता ने देखा कि किस प्रकार मोदी सरकार ने पूरे कोरोना काल में देश को संभालने का काम किया. जहां विश्वशक्ति कहलाने वाले देशों में व्यवस्था चरमरा गई वहीं मोदी सरकार के फैसलों से अर्थव्यवस्था सुनहरे भविष्य का आभास करा रही है. ऐसे में विपक्षी दलों की चाल का असर चुनाव में नहीं पड़ेगा.

उधर, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसर सुबोध कुमार का कहना है कि दरअसल किसान एकवर्ग में संगठित होना भारतीय परिस्थियों में करीब -करीब नामुमिकन है. फिर चुनाव के समय वह क्षेत्रियता और जातियों में विभाजित होकर वोट करते रहे हैं. वह स्थानीय मुद्दों के आधार पर वोट करते हैं न कि खेती किसानी से जुड़े मुद्दों पर.

लिहाजा किसान आंदोलन की मांग हार जीत तय करने लायक मुद्दा बन पाने की संभावना बेहद कम है. हालांकि पेट्रोल- डीजल के बढ़ते दाम और महंगाई का थोड़ा बहुत असर इन चुनावों में नजर आ सकता है. कुमार की माने तो आज के दौर में यदि पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश में चुनाव होते हैं तो वहां जरूर किसान आंदोलन बड़ा मुद्दा हो सकता है.

प.बंगाल के अतिरिक्त असम, पुडुचेरी, केरल और तमिलनाडु में चुनाव में अभी तक स्थानीय मुद्दे ही हावी हैं. हालांकि प.बंगाल में तृणमूल कृषि कानूनों को लेकर भाजपा पर तानाशाही रवैये को लेकर निशाना साध रही है जिसके जवाब में भाजपा 75 लाख किसानों को किसान सम्मान निधि से वंचित रखने के सवाल दाग रही है. ऐसे में कृषि कानूनों की वापसी का मुद्दा यहां भी हाशिए पर जा सकता है.

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