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...नेता जिन्होंने किसान आंदोलन का नेतृत्व किया

By भाषा | Updated: November 19, 2021 16:45 IST

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नयी दिल्ली, 19 नवंबर एक डॉक्टर, एक सेवानिवृत्त शिक्षक, एक पूर्व सैन्यकर्मी, दिल्ली पुलिस का एक पूर्व कांस्टेबल... ये उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन को दिशा दी और आकार दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कानूनों के खिलाफ एक साल से अधिक समय तक चले विरोध प्रदर्शनों के बाद शुक्रवार को इन्हें रद्द करने की घोषणा की।

यहाँ कुछ प्रमुख किसान नेताओं का जिक्र है जिन्होंने विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया :-

राकेश टिकैत... भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता

कभी दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल रहे टिकैत ने सरकार के साथ बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 52 वर्षीय टिकैत चुनावी राजनीति में भी हाथ आजमा चुके हैं और वर्षों से वह बीकेयू के नेता रहे हैं। उन्होंने दिल्ली के पास पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीमाओं पर आंदोलन की कमान संभाली। दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर किसानों की रैली में हुई हिंसा के बाद उनके समक्ष निर्णायक घड़ी आई और पत्रकारों से बातचीत के दौरान वह फफक-फफक कर रो पड़े जिससे आंदोलन को एक नयी ऊर्जा मिली।

दर्शन पाल...सदस्य, कार्यकारी समूह, अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति

पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर, 70 वर्षीय पाल कृषि कानूनों पर केंद्र और राज्य के नेताओं के साथ बातचीत में काफी सक्रिय रहे हैं। उन्होंने किसान संगठनों को एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और वार्ता में समन्वयक के रूप में काम किया। उन्होंने आंदोलन को पंजाब से आगे उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के किसानों तक ले जाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जोगिंदर सिंह उगराहां...अध्यक्ष, बीकेयू (उग्राहां)

लोकप्रिय किसान नेताओं में से एक पूर्व सैन्यकर्मी उगराहां सुनाम के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। वह रेल रोको आंदोलन और भाजपा नेताओं के 'घेराव' सहित पंजाब में विरोध के कुछ आक्रामक पहलुओं के पीछे अपनी टीम के साथ आंदोलन में सबसे आगे रहे हैं। जब अधिकतर किसान संगठन सिंघू बॉर्डर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, तब उनके संगठन ने टीकरी बॉर्डर पर लगभग अकेले ही कमान संभाले रखी।

बलबीर सिंह राजेवाल...अध्यक्ष, बीकेयू

किसानों के दृष्टिकोण की उनकी कुशल अभिव्यक्ति ने केंद्रीय मंत्रियों के साथ बातचीत के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 78 वर्षीय राजेवाल 31 संगठनों की बैठकों के दौरान विरोध की योजना बनाने और उन्हें क्रियान्वित करने वाले प्रमुख नेताओं में से एक थे। विरोध का ‘डिमांड चार्टर’ तैयार करने के पीछे भी उनका ही दिमाग था।

हन्नान मोल्ला...माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य और अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव

विरोध के दौरान कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग को लेकर 75 वर्षीय मोल्ला लगातार आवाज उठाते रहे। उन्होंने कहा है कि संसद में प्रक्रिया के माध्यम से कानूनों को निरस्त किए जाने तक विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा। मोल्ला किसानों के उत्पाद की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद के लिए कानूनी अधिकार की मांग को लेकर भी खड़े हैं और उनका मानना ​​है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए संघर्ष जारी रहेगा।

गुरनाम सिंह चढूनी...अध्यक्ष बीकेयू, हरियाणा

तीनों कृषि कानूनों के पारित होने से पहले किसानों को संगठित करने का श्रेय 65 वर्षीय चढूनी को जाता है। उन्होंने पहले भी कई सफल आंदोलनों का नेतृत्व किया है और विरोध के अनूठे तरीके अपनाए, जिनमें कमीज रहित मार्च और राज्य के राजमार्गों पर आलू फेंकना शामिल है। यह चढूनी के आह्वान पर था कि प्रदर्शनकारियों ने करनाल में भाजपा के एक कार्यक्रम में घुसपैठ की कोशिश की, जिसमें हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर सहित अन्य लोग शामिल थे। इसके बाद हुई कार्रवाई में कई किसान घायल हो गए और खट्टर सरकार ‘बैकफुट’ पर आ गई।

सुखदेव सिंह कोकरीकलां...महासचिव; बीकेयू, उगराहां

वह एक सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक हैं। 71 वर्षीय किसान नेता कोकरीकलां ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन के दौरान पुलिस के साथ टकराव के खिलाफ सबसे आगे रहे हैं।

गतिरोध को तोड़ने के लिए सरकार और किसान संगठनों के बीच 11 दौर की बातचीत हुई और आखिरी बैठक 22 जनवरी को हुई थी। 26 जनवरी के दिन किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान व्यापक हिंसा के बाद बातचीत फिर से शुरू नहीं हो पाई।

सरकार की ओर से, किसानों के साथ वार्ता का नेतृत्व तीन केंद्रीय मंत्रियों ने किया :-

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर:

वह किसानों के साथ बातचीत में भाग लेते रहे हैं और कई मौकों पर उन्होंने किसानों से तीन कृषि कानूनों पर अपना विरोध वापस लेने की अपील करते हुए कहा कि कानून किसानों के पक्ष में हैं।

वाणिज्य एवं उपभोक्ता मामले तथा खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री पीयूष गोयल:

केंद्रीय मंत्री वार्ता में अग्रिम मोर्चे पर रहे। उन्होंने कई मौकों पर कानूनों को किसान हितैषी बताया और बातचीत के माध्यम से समाधान की अपील की।

वाणिज्य राज्य मंत्री सोमप्रकाश:

उन्होंने किसानों के साथ बातचीत में भाग लिया और कहा कि सरकार ने पूरे देश के हित को ध्यान में रखते हुए कानून बनाए हैं।

शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के सुखबीर सिंह बादल:

कृषि कानूनों पर गतिरोध ने भाजपा के सबसे पुराने और सबसे करीबी सहयोगी शिअद को भी उसके खिलाफ कर दिया। सुखबीर सिंह बादल ने संसद के पटल से घोषणा की कि उनकी पत्नी हरसिमरत कौर बादल केंद्र द्वारा संसद में पारित कराने के लिए रखे गए कृषि विधेयकों के विरोध में इस्तीफा दे देंगी।

कृषि विधेयकों में से दो पर चर्चा के दौरान अपने भाषण में बादल ने कहा कि प्रस्तावित कानून पंजाब की सरकारों और किसानों द्वारा कृषि क्षेत्र के निर्माण के लिए की गई 50 वर्षों की कड़ी मेहनत को "नष्ट" कर देंगे। इसके तुरंत बाद तत्कालीन केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसमिरत ने कानूनों के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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