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SC/ST एक्ट पर विवाद क्या है, मायावती पर क्यों आरोप लगा रहे हैं ट्रॉलर्स?

By जनार्दन पाण्डेय | Updated: September 5, 2018 17:53 IST

एससी/एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट ने कई बड़े बदलाव किए थे,‌ जिसके खिलाफ बीजेपी अध्यादेश ले आई थी।

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नई दिल्ली, 5 सितंबरः एससी एसटी एक्ट के लागू होने के बाद से सवर्ण समाज में उबाल है। गुरुवार (छह दिसंबर) को इस एक्ट के लागू होने के विरोध में सवर्ण भारत बंद का ऐलान कर चुके हैं। सोशल मीडिया में अनुसूचित जाति व अनसूचित जनजाति वर्ग के ज्यादा करीब कौन? पर बहस चल रही है। लेकिन इस एक्ट के बहाली से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से नाराज सवर्णों को भुनाने में कांग्रेस व दूसरी पार्टियां लग गई हैं। इसके बाद एक बेहद अजीब स्थिति पैदा हुई है, जिसमें बीजेपी समर्थक यह जताने की कोशिश कर रहे हैं इस फैसले नाराज सवर्णों को कांग्रेस की तरफ झुकाव नहीं करना चाहिए। इसके लिए वे मायावती को निशाना बना रहे हैं। ट्रॉलर्स कहा कहना है, यह एक्ट कांग्रेस ले आई थी। साथ ही कांग्रेस का जुड़ाव मायावती से है, जो इस एक्ट की घोर समर्थक हैं। ऐसे में सवर्णों को बीजेपी का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।

एससी/एसटी एक्ट को जानने के लिए नीचे हमने कुछ बुलेट प्वाइंट लिखे हैं। इसमें एसटी/एसटी एक्ट के आने से लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से हुए सुधारों और इसे दोबारा लागू होने तक की जानकारी है। 

कब आया SC/ST एक्ट

- शेड्यूल कास्ट/शेड्यूल ट्राइब (निरोधक अत्याचार) एक्ट, 1989 भारतीय संसद में सितम्बर 1989 में पारित किया गया।- इस वक्त केंद्र में राजवी गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सकरार थी।- एससी/एटी एक्ट 1989 पूरे भारत में जनवरी 1990 से लागू हुआ।- इस वक्त केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) के नेतृत्व में जनता दल की अगुवाई वाली नेशनल फ्रंट (गठबंधन) की सरकार थी।-यह अध‌िनियम केवल एससी/एसटी सदस्यों से दूसरी जातियों के द्वारा अपराध किए जाने पर ही लागू होता है।

SC/ST एक्ट का उद्देश्य

इस अधिनियम का उद्देश्य लगातार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के साथ दूसरी जातियों के द्वारा किए जा रहे अत्याचार पर लगाम लगाना था। 

SC/ST एक्ट की विशेषताएं

- इस अधिनियम मे 5 अध्याय एवं 23 धाराएं है।- इनके तहत सार्वाधिक प्रभावशाली बात यह है कि कार्रवाई तत्काल होती है। - इन धाराओं से अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को आर्थिक बहिष्कार, सामाजिक बहिष्कार से बचाया जाता है। साथ ही सरकारी कर्मचारियों की ओर से दलितों का काम ना करने पर दंडित करने का प्रावधान है।

SC/ST के आर्थिक बहिष्कार के क्या मायने हैं

अगर कोई शख्स किसी भी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखने वाले शख्स के साथ किसी तरह के बिजनेस करने से इंकार करता है, तो उसके ऊपर इस एक्ट के तहत मामला दर्ज करया जा सकता है। इन दोनों ही जाति विशेष के व्यक्ति को अगर को अगर नौकरी पर रखने अथवा उसे काम देने मना करता है तो उसे इस एक्‍ट के तहत अधिनियम का उल्लंघन माना जाएगा। यही नियम सेवा देने अथवा सेवा लेने के मामले में भी होगा।

SC/ST के सामाजिक बहिष्कार के क्या मायने हैं

किसी भी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को जानबूझकर या बलपूर्वक किसी खास क्षेत्र में रहने को मजबूर किया जाता है। अथवा अगर वह किसी अन्य क्षेत्र में घर बनाकर रहना चाहता है तो उसका विरोध करता है, या उससे संपर्क में आने से मना करता रहता है तो उसे इस एक्ट के तहत रखा जाएगा और उसके लिए उसे दंडित किया जाएगा।

SC/ST एक्ट में किन बातों को माना गया अपराध

- SC/ST सदस्य की सूचना पर मामला दर्ज हो- SC/ST सदस्य को जबरन मल-मूत्र ‌खिलाना- SC/ST सदस्य को पीटना, उसे अपमानित करने के लिए जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करना-SC/ST सदस्य को उसके घर के आसपास कूड़ा फैलाना, मृत पशु या मैल फेंकना- SC/ST सदस्य को बलपूर्वक नंगा करना, चेहरे पर कालिख आदि पोतना, उसे गांव में घूमना- SC/ST सदस्य की जमीन पर कब्जा अ‌थवा जबरन फसल काटना- SC/ST सदस्य को भीख मांगने के लिए मजबूर करना, बंधुआ मजदूर बनाना- सरकारी कर्मचारियों के समक्ष झूठी जानकारी से इन दोनों जाति विशेष के लोगों को परेशान करना- SC/ST म‌हिलाओं का अनादर व उनके साथ जबरन रसूख का फायदा उठाकर अत्याचार करना- SC/ST महिलाओं का यौन शोषण करना- SC/ST सदस्य के जलकूपों, जलाशयों से जबरन दूर रखना- SC/ST सदस्यों को सार्वजनिक जगहों पर जाने से रोकना- SC/ST सदस्य को उसका घर छोड़ने पर मजबूर कना

SC/ST एक्ट के तहत क्या दंड मिलता है

- SC/ST एक्ट के तहत अधिनियम के उल्लंघन की सूचना मिलते ही तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए।- अधिनियम के उल्लंघन में कम से कम छह छह महीने से लेकर 5 साल तक की जेल की सजा हो सकती है।- उल्लंघन पर अर्थ दंड भी दिया जा सकता है।- क्रूरता से हत्या पर अधिनियम के तहत मृत्यूदंड भी दिया जा सकता है।

SC/ST (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक 2014

- मार्च 2014 में एससी/एसटी एक्ट में संसोधन सुझाए गए। तब एक अध्यादेश लाकर इस एक्ट में कुछ सुधार किए जाने चर्चा छिड़ी। इससे पहले भी 2013 में इस एक्ट में सुधार के लिए पहल की गई थी। लगातार इस एक्ट के गलत इस्तेमाल होने के मामले सामने आ रहे थे। अंत में जुलाई SC/ST (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक 2014 भारतीय संसद में लाया गया। इसके बाद से इसे स्टैंडिंग कमेटी को भेज दिया गया। बाद में अगस्त में बिल के पास हो जाने के बाद इस एक्ट में संशोधन कर दिए गए। लेकिन इसमें भी तत्काल गिरफ्तारी व अग्र‌िम जमानत ना मिलने आदि पर सहमति नहीं बनी थी। इसलिए संशोधित विधेयक ही पास हुआ था, जिस पर कुछ बदलाव ही किए जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट पर क्या आदेश दिया था

फरवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ तथ्यों के आधार पर डॉक्टर सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य और एएनआर मामले पर एक आदेश दिया ‌था। इसकी खास बातें इस प्रकार हैं- 

- मामले में सूचना पर अ‌‌भियुक्त गिरफ्तारी जरूरी नहीं है। भले मामला दर्ज कर लिया गया हो।- मामला दर्ज होने के शुरुआती सात दिनों में जांच हो।- अगर अभियुक्त सरकारी मुलाजिम है तो उनकी गिरफ्तारी में उन्हें नियुक्त करने वाले अध‌िकारी की सहमति हो।- अभियुक्त के सरकारी कर्मचारी ना होने पर उनकी गिरफ्तारी के लिए क्षेत्र के एसएसपी की सहमति होनी चाहिए।- एक्ट के सेक्शन 18 में अग्रिम जमानत ने दिए जाने का उल्लेख है। ऐसा नहीं होना चाहिए। अग्र‌िम जमानत मिलनी चाहिए।- इस एक्ट के जरिए कई बार संविधान में उल्लिखित अधिकारों का पाल नहीं हो पाता।

SC/ST एक्ट के गलत इस्तेमाल की दुहाई देते NCRB आंकड़े

- साल 2015 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने एक डेटा जारी किया था। इसमें बताया गया कि 15-16% मामलों में जांच के बाद पुलिस ने ही क्लोजर रिपोर्ट फाइल की।- अदालत में गए 75% मामलों को या तो कोर्ट ने खत्म कर दिया। या फिर खुद अभियोजन पक्ष ने अपने मामले वापस ले लिए। या फिर अभियुक्त बरी हो गए।

SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अध्यादेश

- अगस्त 2018 में भारतीय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ अध्यादेश लाकर एक्ट को फिर से बहाल कराया। सत्ता पक्ष कहना है कि विपक्षी दलों का इसके लिए दबाव था।

SC/ST एक्ट पर राजनीति

कई कानूनविदों का कहना है कि इस वक्त कोई भी राजनैतिक दल इस एक्ट के खिलाफ नहीं जा सकता। आगामी चुनावों में कोई भी दल करीब 27 फीसदी एससी/एसटी वोट बैंक को नाराज नहीं कर सकता है। इसलिए विपक्ष भी दबे सुर ही इस पर सरकार पर एक्ट कमजोर करने का आरोप लगाया और मामले को रफा-दफा कर दिया। कई दलों इसके पक्ष में हैं। वर्तमान विवाद सवर्णों की नाराजगी का है। जिनका दावा है कि इस अधिनियम का दुरुपयोग हो रहा है। इस कानून के आने के बाद ईमानदार टिप्पणियां भी मुकदमे का कारण बन जाती हैं। जबकि एससी/एसटी वर्ग का कहना है कि उन लोगों को सुरक्षित रखने के लिए इस एक्ट की बेहद आवश्यकता है।

टॅग्स :एससी-एसटी एक्टमायावतीभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
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