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लोकसभा चुनावः क्या अशोक गहलोत सरकार को अस्थिर करना आसान है?

By प्रदीप द्विवेदी | Updated: May 21, 2019 19:24 IST

बहुमत के नजरिए से देखें तो इस वक्त कांग्रेस के पास 200 में से 100 विधानसभा सीटें हैं. यही नहीं, मायावती की बसपा का भी कांग्रेस को समर्थन प्राप्त है.

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ठळक मुद्देविस चुनाव 2018 के बाद जहां कांग्रेस को 100 सीटें मिली वहीं, बीजेपी- 73 पर अटक गई. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गहलोत सरकार को अस्थिर करने के लिए बीजेपी को एक दर्जन से ज्यादा एमएलए की जरूरत है.

यूपी में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ये संकेत दे दिए थे कि उनकी नजर राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार पर है और समय आने पर बीजेपी इसे अस्थिर करने का प्रयास कर सकती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अशोक गहलोत सरकार को अस्थिर करना आसान है?

बहुमत के नजरिए से देखें तो इस वक्त कांग्रेस के पास 200 में से 100 विधानसभा सीटें हैं. यही नहीं, मायावती की बसपा का भी कांग्रेस को समर्थन प्राप्त है. पीएम मोदी ने गहलोत सरकार पर पहला हमला यहीं से किया था, जब उन्होंने अलवर गैंगरेप मामले में मायावती को सियासी सुझाव दिया था कि वह राजस्थान की गहलोत सरकार से समर्थन वापस ले ले.

क्या पलट सकता है पासा

अब, यदि केन्द्र में फिर से एनडीए की सरकार बनती है और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो मोदी टीम विस चुनाव 2018 की हारी हुई बाजी पलटने की कोशिश कर सकती है. हालांकि, अशोक गहलोत ने बसपा के अलावा भी अपने समर्थन में ज्यादातर निर्दलीय विधायकों को साथ ले रखा है, किन्तु बीजेपी की राजनीतिक जोड़तोड़ से बचने के लिए सियासी सतर्कता जरूरी है.

विस चुनाव 2018 के बाद जहां कांग्रेस को 100 सीटें मिली वहीं, बीजेपी- 73 पर अटक गई. मायावती की बसपा ने कांग्रेस का साथ दिया और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गई.

जोड़-तोड़ समीकरण 

बीजेपी भी लोकसभा चुनाव से पहले हनुमान बेनीवाल को अपने साथ लेने में कामयाब रही, इस तरह बीजेपी को भी एक नई सहयोगी पार्टी मिल गई, लेकिन अशोक गहलोत सरकार को अस्थिर करने के लिए, बीजेपी को कम-से-कम तीन मोर्चों पर जोड़तोड़ करनी होगी, एक- बसपा को कांग्रेस से अलग करना, दो- निर्दलीय विधायकों को अपने साथ लेना, और तीन- कांग्रेस विधायकों को तोड़ना. 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गहलोत सरकार को अस्थिर करने के लिए बीजेपी को एक दर्जन से ज्यादा एमएलए की जरूरत है, जो इस समय संभव नहीं है. सीएम गहलोत को भी इस जोड़तोड़ का पूर्वानुमान है और इसीलिए उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान ही निर्दलीय विधायकों को साथ लेकर अपना गढ़ मजबूत कर लिया था.

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