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लॉकडाउन का एक साल: वैक्सीन लगवाएं, मास्क पहनें और उचित दूरी के नियमों का करें पालन

By एसके गुप्ता | Updated: March 25, 2021 19:26 IST

लॉकडाउन को एक साल हो चुका है। लोग लॉक डाउन से सीखते हुए सही से मास्क पहनें, हाथों को साबुन से धोएं और उचित दूरी के नियमों का पालन करें।

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ठळक मुद्देवैक्सीनेशन के लिए को-विन एप पर रजिस्ट्रेशन कराकर वैक्सीनेशन अभियान से जुड़ें। कोरोना के आंकड़ों का दिन-प्रतिदिन ग्राफ बढ़ रहा है।लोगों द्वारा सही से मास्क पहनने में ढिलाई और सोशल डिस्टेंसिंग का सही से पालन नहीं करना है।

नई दिल्लीः कोरोना की दूसरी लहर और डबल म्यूटंट वैरिएंट को लेकर विशेषज्ञ चिंतित हैं। जरा सी लापरवाही घातक साबित हो सकती है।

 

लॉकडाउन को एक साल हो चुका है। लोग लॉक डाउन से सीखते हुए सही से मास्क पहनें, हाथों को साबुन से धोएं और उचित दूरी के नियमों का पालन करें। इसके अलावा वैक्सीनेशन के लिए को-विन एप पर रजिस्ट्रेशन कराकर वैक्सीनेशन अभियान से जुड़ें। जिस तरह से कोरोना के आंकड़ों का दिन-प्रतिदिन ग्राफ बढ़ रहा है।

उसे देखकर यही कहा जा रहा है कि जरा सी चूक आपको वहीं लाकर खड़ा कर सकती है, जहां से एक साल पहले शुरुआत हुई थी। कोविड-19 टास्क फोर्स के चेयरमेन एवं नीति आयोग के सदस्य डा. वीके पॉल ने कहा है कि कोरोना की फिर से लहर आने का मुख्य कारण लोगों द्वारा सही से मास्क पहनने में ढिलाई और सोशल डिस्टेंसिंग का सही से पालन नहीं करना है।

यही वजह है कि राज्य सरकारों से त्योहारों पर स्थानीय प्रतिबंध लगाने के लिए कहा गया है। जरा सी लापरवाही घातक साबित हो सकती है। सरकार ने हेल्थ सिस्टम को बहुत अपग्रेड किया है। पहले हमारे पास वैक्सीन नहीं थी लेकिन अब एक नहीं दो वैक्सीन हैं। कोरोना महामारी से बचने का यही एक मात्र सुरक्षा कवच है।

लोगों को वैक्सीन लगवानी चाहिए और इसमें सरकारी अस्पतालों के साथ प्राइवेट अस्पतालों को भी अपनी क्षमता बढ़ानी चाहिए। डा. पॉल ने कोरोना के डबल म्‍यूटंट वैरिएंट पर कहा कि अभी तक यही पता लगा है कि नया स्‍ट्रेन असरदार तो है मगर शायद सुपरस्‍प्रेडर नहीं है। इसके भी सबूत अबतक नहीं मिले हैं कि यह घातक है। वैज्ञानिक कुछ और डेटा मिलने के बाद ही स्‍पष्‍ट बता सकेंगे।

कोरोना वायरस के नए वैरिएंट पर वैक्सीन असर न करे अभी तक ऐसी कोई वजह नहीं दिख रही है, इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि म्यूटंट वैरिएंट पर वैक्सीन सुरक्षा देने में नाकायब होगी। नेशनल सेंटर फोर डिजिज कंट्रोल (एनसीडीसी) निदेशक डा. सुजीत कुमार सिंह ने कहा कि वायरस का एक जेनेटिक कोड होता है। इसे एक तरह का मैनुअल समझें जो वायरस की प्रकृति को दर्शाता है।

वायरस के जेनेटिक कोड में लगातार छोटे-छोटे बदलाव होते रहते हैं। अधिकाशं बदलाव बेअसर होते हैं मगर कुछ की वजह से वायरस तेजी से फैलने लगता है या घातक सकता है। बदले हुए वायरस को वैरिएंट कहते हैं। जैसे यूके और साउथ अफ्रीका वाले वैरिएंट को ज्‍यादा संक्रामक और घातक माना जा रहा है। 

उन्होंने कहा कि जिन राज्‍यों में केसेज तेजी से बढ़े हैं, वहां अलग म्‍यूटेशन प्रोफाइल का पता चला है। जो नया 'डबल म्‍यूटंट' वैरिएंट है, वो करीब 15-20 फीसदी सैंपल्स में मिला है। यह पहले से कैटलॉग किए गए वैरिएंट्स से मैच नहीं करता। इसे महाराष्‍ट्र के 206 सैम्‍पल्‍स में और दिल्ली के 9 सैंपल्स में पाया गया है। 

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