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जम्मू-कश्मीरः पंचायत चुनावों पर मंडरा रहा है आतंक का साया

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: October 17, 2020 15:46 IST

प्रदेश में 30 सालों के आतंकवाद के इतिहास में एक हजार से अधिक राजनीतिज्ञों की हत्याएं आतंकी कर चुके हैं। इनमें से अधिकतर के पास सुरक्षा भी थी। फिर भी आतंकी उन्हें मारने में कामयाब रहे थे।

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ठळक मुद्देप्रदेश में अगले कुछ दिनों में होने जा रहे पंचायतों के उप चुनावों पर आतंकी साया मंडरा रहा है।इसकी पुष्टि उस उच्च स्तरीय बैठक में दिए जाने वाले निर्देशों से होती थी जिसमें उप राज्यपाल मनोज सिन्हा चाहते थे कि यह हिंसा से मुक्त हों।

जम्मूः प्रदेश में अगले कुछ दिनों में होने जा रहे पंचायतों के उप चुनावों पर आतंकी साया मंडरा रहा है। इसकी पुष्टि उस उच्च स्तरीय बैठक में दिए जाने वाले निर्देशों से होती थी जिसमें उप राज्यपाल मनोज सिन्हा चाहते थे कि यह हिंसा से मुक्त हों। यही कारण था कि पंचायत चुनावों की सुरक्षा की खातिर 4 जी को पूरे प्रदेश में शुरू करने की प्रक्रिया की बलि चढ़ा दी गई है।

प्रदेश में पंचों व सरपंचों के कुल 37882 पद हैं। इनमें 4290 सरपंच व 33592 पंच हैं। दिसम्बर 2018 में आखिरी बार चुनाव हुए तो 12209 पदों पर आतंकी खतरे के कारण मतदान ही नहीं हो पाया। अब चुनाव आयोग ने 12168 पंचों व 1089 सरंपचों को चुनने के लिए नवम्बर में चुनावों की घोषणा की है।

इस घोषणा के बाद पंचायत हल्कों में गम और खुशी का माहौल जरूर है। कारण स्पष्ट है। आतंकी खतरा अभी तक टला नहीं है। प्रदेश में एक बार 25 सालों तक पंचायत चुनाव जरूर टाले गए थे। दिसम्बर 2018 में अंतिम बार चुनाव हुए थे। पर पंचायत प्रतिनिधियों की राह आसान नहीं रही। उन्हें हमेशा खतरा महसूस होता रहा। 

खतरा कितना था इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वर्ष 2018 के बाद 22 पंचों-सरंपचों को मौत के घाट उतारा जा चुका है, उनके द्वारा की जाने वाली सुरक्षा मुहैया करवाने की मांग पर पुलिस का कहना था कि इतने लोगों को सुरक्षा मुहैया नहीं करवाई जा सकती। हालांकि मात्र 60 को मुहैया करवाई गई सुरक्षा किसी को भी संतुष्ट नहीं कर पाई।

प्रदेश में 30 सालों के आतंकवाद के इतिहास में एक हजार से अधिक राजनीतिज्ञों की हत्याएं आतंकी कर चुके हैं। इनमें से अधिकतर के पास सुरक्षा भी थी। फिर भी आतंकी उन्हें मारने में कामयाब रहे थे। ऐसे में सुरक्षा क्या उनकी जान बचा पाएगी जो इसकी मांग कर रहे हैं, के प्रति एक सरपंच का कहना था कि फिर भी बचने की आस बनी रहती है।

इतना जरूर था कि इस अरसे में अभी तक करीब 2000 पंच-सरपंच आतंकी धमकियों के कारण त्यागपत्र भी दे चुके हैं। उन्होंने अपने त्यागपत्रों की घोषणा अखबारों में इश्तहार के माध्यम से की थी। दरअसल दूर-दराज के आतंकवादग्रस्त इलाकों में रहने वाले राजनीतिज्ञों को अक्सर कश्मीर में पिछले 30 सालों में झुकना ही पड़ा है। और अब एक बार फिर पचों और सरपंचों को लोकतंत्र का स्तंभ बना खतरे में झौंक दिया गया है।

सारे घटनाक्रम में प्रदेश के नागरिकों की परेशानी यह है कि सरकार ने इस माह 21 अक्तूबर से सारे प्रदेश में 4 जी सेवाएं चालू करने का मन बना लिया था। इसके प्रति कई बार संकेत भी दिए गए थे। लेकिन अब जबकि सरकार और प्रशासन के साथ ही सुरक्षाबल पंचायत चुनावों पर खतरा महसूस कर रहे हैं, 4 जी को शुरू करने की प्रक्रिया को नवम्बर के अंत तक टाल दिया गया है जिस कारण लोगों में नाराजगी का माहौल जरूर है।

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