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दिल्ली दंगा मामला: अदालत ने छात्र कार्यकर्ताओं की ‘तत्काल रिहाई’ पर आदेश बृहस्पतिवार तक टाला

By भाषा | Updated: June 16, 2021 22:53 IST

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नयी दिल्ली, 16 जून दिल्ली की एक अदालत ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्र कार्यकर्ताओं-नताशा नरवाल और देवांगना कालिता की तत्काल रिहाई पर बुधवार को अपना आदेश बृहस्पतिवार तक के लिए टाल दिया।

इन छात्र कार्यकर्ताओं को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगे से जुड़े मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को जमानत दे दी थी।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रविंदर बेदी ने कहा, ‘‘अधोहस्ताक्षरी के समक्ष सूचीबद्ध जमानत आवेदनों के भारी भार के चलते आदेश पारित नहीं किया जा सका। इसे कल पूर्वाह्न 11 बजे के लिए रखिए।’’

न्यायाधीश ने इससे पहले, आज अभियोजन और आरोपियों के वकीलों की लंबी दलील सुनने के बाद आदेश आज के लिए सुरक्षित रख लिया था।

उच्च न्यायालय ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्राओं के साथ जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र आसिफ इकबाल तनहा को भी कल जमानत दे दी थी। हालांकि, वे अभी जेल से रिहा नहीं हो पाए हैं।

गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज मामले में जमानत मिलने के बाद महिला कार्यकर्ताओं ने तत्काल रिहाई के लिए निचली अदालत से संपर्क किया था।

कार्यवाही के दौरान दिल्ली पुलिस ने आरोपियों को जमानत पर रिहा करने से पहले उनके पते, जमानतदारों तथा आधार कार्ड के सत्यापन के लिए अदालत से और समय मांगा।

न्यायाधीश को बताया गया कि सत्यापन की प्रक्रिया को पूरा करने में तीन दिन लगेंगे।

आरोपियों की ओर से पेश वकील अदित पुजारी ने आरोप लगाया कि पुलिस उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद आरोपियों की रिहाई में जानबूझकर विलंब कर रही है।

पुजारी ने पुलिस से कहा, ‘‘आप उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रख रहे हैं। जमानत मिल चुकी है और तब से 24 घंटे हो चुके हैं।’’

इस बीच, दिल्ली पुलिस ने आरोपियों को जमानत देने के उच्च न्यायालय के आदेश को आज उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।

तीनों छात्र कार्यकर्ताओं को पिछले साल फरवरी में हुए दंगों से जुड़े मामलों में सख्त गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मई 2020 में गिरफ्तार किया गया था।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कल तीनों को जमानत देते हुए कहा था कि राज्य ने प्रदर्शन के अधिकार और आतंकी गतिविधि के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है तथा यदि इस तरह की मानसिकता मजबूत होती है तो यह ‘‘लोकतंत्र के लिए एक दुखद दिन होगा।’’

इसने यूएपीए के तहत ‘आतंकवादी गतिविधि’ की परिभाषा को ‘‘कुछ न कुछ अस्पष्ट’’ करार दिया और इसके ‘‘लापरवाह तरीके’’ से इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी देते हुए छात्र कार्यकर्ताओं को जमानत देने से इनकार करने के निचली अदालत के आदेशों को निरस्त कर दिया था।

उच्च न्यायालय ने 113, 83 और 72 पृष्ठों के तीन अलग-अलग फैसलों में कल कहा था कि यूएपीए की धारा 15 में ‘आतंकवादी गतिविधि’ की परिभाषा व्यापक है और कुछ न कुछ अस्पष्ट है, ऐसे में आतंकवाद की मूल विशेषता को सम्मिलित करना होगा तथा ‘आतंकवादी गतिविधि’ मुहावरे को उन आपराधिक गतिविधियों पर ‘‘लापरवाह तरीके से’’ इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती जो भारतीय दंड संहिता के तहत आते हैं।

अदालत ने कहा था, ‘‘ऐसा लगता है कि असहमति को दबाने की अपनी बेताबी में सरकार के दिमाग में प्रदर्शन करने के लिए संविधान प्रदत्त अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच की रेखा कुछ न कुछ धुंधली होती हुई प्रतीत होती है। यदि यह मानसकिता प्रबल होती है तो यह लोकतंत्र के लिए एक दुखद दिन होगा...। ’’

गौरतलब है कि 24 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में संशोधित नागरिकता कानून के समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसा भड़क गई थी, जिसने सांप्रदायिक टकराव का रूप ले लिया था। हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई थी तथा करीब 200 अन्य घायल हुए थे।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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