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"गोहत्या गलत, लेकिन आवारा जानवरों के कारण समस्या बढ़ी"

By भाषा | Updated: March 9, 2021 14:22 IST

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(जतिन ठक्कर/किशोर द्विवेदी)

(यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर हमारी श्रृंखला का हिस्सा है... तस्वीरों के साथ)

मेरठ (उप्र) नौ मार्च पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चिलचिलाती धूप में गन्ने से लदी ट्रैक्टर-ट्रालियां राजमार्ग पर नजर आईं, जिनके आसपास खड़े लोग उन्हें आवारा जानवरों से बचाने की कोशिश कर रहे थे।

मेरठ जिले में गंग नहर के नजदीक कांटे (तोल मशीन) के पास बैठे जुम्मा (72) ‘मिल’ पहुंचने से पहले अपने गन्नों की आवारा जानवरों से रक्षा करते नजर आए।

क्षेत्र में आवारा जानवरों की संख्या काफी बढ़ रही और इसके लिए विभिन्न धर्म के लोगों ने राज्य में उनके मारने पर लगी रोक को जिम्मेदार ठहराया है।

जुम्मा (72) दिल्ली से लगी सीमाओं पर 100 से अधिक दिनों से जारी किसानों के आंदोलन से भी अवगत दिखे। वहीं, उन्होंने फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यों (एमएसपी) की कानूनी गारंटी को लेकर भी चिंता जाहिर की।

उन्हीं की तरह अकबर अली ने भी अपनी फसलों की जानवरों से रक्षा के लिए कुछ लोगों को काम पर रखा है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में अपनी फसलों को आवारा जानवरों से बचाने के लिए लोगों को नौकरी पर रखने वाले मजबूर किसान सरकार से उनके समुदाय की अधिक मदद करने की उम्मीद भी कर रहे हैं।

जुम्मा ने बताया कि वह केन्द्र सरकार के एक ‘वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन’ के लिए काम करते थे। उन्हें ज्यादातर घर से दूर रहना पड़ा और करीब एक दशक पहले वह मेरठ वापस आए।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘ यहां मेरे गांव में, नगलामल चीनी मिल ने मुझे और कुछ स्थानीय लोगों को फसलों की आवारा जानवरों से रक्षा करने के लिए रखा है। शुरुआत में यह आम सा काम लगा और उससे मुझे कुछ पैसे भी मिल रहे थे।’’

जुम्मा ने बताया कि फसलों की रक्षा करने वालों को हर मौसम के 4500 रुपये दिए जाते हैं और जबकि उन्हें गर्मी, सर्दी और बरसात हर मौसम में फसलों की रक्षा करनी होती है।

उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि साल भर चीनी मिल की सुरक्षा में तैनात रहने के लिए उनके वेतन में बढ़ोतरी की जानी चाहिए और सरकार द्वारा इसके लिए उन्हें कुछ पेंशन भी दी जानी चाहिए।

जानी खुर्द के पास पांच से छह कांटे (निजी मापने की मशीने) हैं और हर केन्द्र के पास एक व्यक्ति को नीलगाय, गाय, भैंस और जंगली सूअर जैसे जानवरों को भगाने के लिए रखा गया है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, मेरठ और निकटवर्ती मुजफ्फरनगर और बागपत जिले में चीनी की दर्जनों मिलें हैं और सैकड़ों कांटे हैं।

सथेरी गांव में एक सरकारी नौकरी करने वाले और खेत के मालिक रमेश चंद्रा (55) ने बताया कि जुताई, बीज बोना, सिंचाई और उर्वरकों का उपयोग अब बहुत महंगा हो गया है और श्रमिकों का वेतन भी एक समस्या बन गया है।

आवारा जानवरों का उत्पात सबसे बड़ी समस्या बन गया है, जिनकी हत्या पर भाजपा सरकार ने राज्य में रोक लगा दी है।

चंद्रा ने कहा कि क्षेत्र में किसानों को जानवरों से अपनी फसलों की रक्षा खुद करनी पड़ती है। कई किसान मिलकर भी सुरक्षा के लिए लोग तैनात करते हैं और जो ऐसा नहीं कर पाते वे खुद फसलों की रक्षा करते हैं।

चंद्रा ने दावा किया कि उनके भाई की सात बीघा जमीन आवारा जानवरों ने बर्बाद कर दी थी, जिस पर उन्होंने गेंहू की खेती की थी।

वहीं, राजकुमार हैरेन ने कहा, ‘‘ जब मवेशी अनुपयोगी हो जाते हैं तो लोग उन्हें दूसरे गांव में छोड़ देते हैं। दूसरे गांव के लोग भी ऐसा ही करते हैं। इन मवेशियों के वध पर प्रतिबंध के कारण लोगों को ऐसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है।’’

चंद्रा ने कहा, ‘‘जहां तक हिंदू धर्म की बात है, मैं गोहत्या के खिलाफ हूं लेकिन अगर आप किसानों की हालत देखेंगे, जो अपने उपयोगी जानवरों का चारा भी नहीं खरीद सकते, वे अनुपयोगी बन चुके जानवरों को कैसे रख पाएंगे। खेती को हो रहे नुकसान को देखते हुए, मुझे अनुपयोगी हो चुके जानवरों का काटा जाना अनुचित नहीं लगता।’’

राजपाल सिंह (57) की गेहूं की खेती भी इन आवारा जानवरों ने बर्बाद कर दी थी।

उन्होंने कहा, ‘‘अगर किसानों के पास चारा खरीदने के लिए पैसे होते तो वे अपने जानवरों को क्यों यहां वहां आवारा घूमने के लिए छोड़ते?’’

चंद्रा, हैरेन, और सिंह तीनों ने कहा कि आवारा जानवरों के उत्पात से निजात पाने का कोई तरीका उन्हें नजर नहीं आता।

चंद्रा ने दावा किया, ‘‘इन आवारा जानवरों के लिए गोशाला बनाए जाने के दावे खोखले हैं। जमीनी स्तर पर ऐसा कुछ नहीं हुआ है।’’

भारतीय किसान यूनियन की मेरठ इकाई के उपाध्यक्ष सुभाष सिंह ने कहा कि स्थानीय जन प्रतिनिधि और अधिकारी इस समस्या से अवगत हैं लेकिन अभी तक इससे निपटने के लिए कुछ नहीं किया गया है।

उन्होंने कहा, ‘‘किसानों के प्रतिनिधि के तौर पर हमने बार-बार इन समस्याओं को रेखांकित किया है, लेकिन यह अब भी सरकार की प्राथमिकता नहीं है। गन्ने के दाम तीन साल से नहीं बढ़े हैं जबकि बाकी चीजों के दाम बढ़े हैं।’’

गौरतलब है कि हजारों की तादाद में किसान केन्द्र के तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने और उनकी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्यों (एमएसपी) की कानूनी गारंटी देने की मांग को लेकर 28 नवम्बर से दिल्ली से लगी सीमाओं पर डटे है। इनमें अधिकतर किसान उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा से हैं।

बहरहाल, सरकार लगातार यही बात कह रही है कि ये कानून किसान समर्थक हैं।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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