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न्यायालय ने नफरत फैलाने वाले भाषण के लिए प्राथमिकी की मांग वाली अर्जी का शीघ्र निस्तारण करने को कहा

By भाषा | Updated: December 17, 2021 21:58 IST

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नयी दिल्ली, 17 दिसंबर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को दिल्ली उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि वह उस अर्जी का शीघ्रता से निस्तारण करे और अच्छा हो कि यह तीन महीने के भीतर किया जाए, जिसमें कुछ नेताओं के खिलाफ कथित तौर पर नफरत फैलाने वाले उनके भाषणों के लिए प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध किया गया है, जिसके कारण कथित तौर पर पिछले साल उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़के थे।

अर्जी न्यायमूर्ति एल एन राव और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आयी। इस अर्जी में भड़काऊ भाषण देने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था, जिसने लोगों को पिछले साल कथित तौर पर हिंसा में शामिल होने के लिए उकसाया।

हिंसा के पीड़ित तीन याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने पीठ को बताया कि शीर्ष अदालत के पिछले साल मार्च के उस आदेश के बावजूद जिसमें उच्च न्यायालय से याचिका का जल्द से जल्द निस्तारण करने के लिए कहा गया था, इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है।

पीठ ने कहा, ‘‘हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस रिट याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं। रिट याचिका खारिज की जाती है।’’

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा है कि उच्च न्यायालय के समक्ष भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका में कोई प्रगति नहीं हुई है। हालांकि, इस अदालत ने उच्च न्यायालय को रिट याचिका पर शीघ्र निर्णय लेने का निर्देश दिया था।

पीठ ने उच्च न्यायालय से याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका का शीघ्रता से निस्तारण करने का अनुरोध किया, अच्छा होगा कि आज से तीन महीने के भीतर निपटारा हो जाए।

पिछले साल 4 मार्च को, शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय को 6 मार्च, 2020 को सुनवाई के लिए कहा था, जिसमें कथित रूप से नफरत फैलाने वाले भाषणों के लिए कुछ भाजपा नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध किया गया था, जिसके कारण दिल्ली में दंगे हुए थे।

इसने कहा था कि उच्च न्यायालय विवाद के ‘‘शांतिपूर्ण समाधान’’ की संभावना तलाश सकता है।

शीर्ष अदालत ने पिछले साल 10 दंगा पीड़ितों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया था, जिसमें भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा, प्रवेश वर्मा और अभय वर्मा तथा अन्य के खिलाफ उनके कथित नफरत फैलाने वाले भाषणों के लिए प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध किया गया था।

शुक्रवार को, शीर्ष अदालत अधिवक्ता सत्य मित्रा के माध्यम से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई का अनुरोध किया गया था, जिनके नफरत फैलाने वाले भाषणों के परिणामस्वरूप कथित तौर पर दिल्ली में दंगे हुए थे।

सुनवाई के दौरान गोंजाल्विस ने पीठ से कहा कि याचिका का शीघ्रता से निस्तारण के शीर्ष अदालत के आदेश के बावजूद कथित तौर पर नफरत फैलाने वाले भाषण से जुड़ा मामला उच्च न्यायालय में आगे नहीं बढ़ा। उन्होंने कहा, ‘‘हमारा विश्वास उठ रहा है। इस व्यवस्था पर किसी का विश्वास कैसे हो सकता है।’’

शीर्ष अदालत में दायर याचिका में हिंसा में दिल्ली पुलिस की भूमिका की स्वतंत्र जांच का भी अनुरोध किया गया है।

याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं ने पहले शीर्ष अदालत का रुख किया था, जिसने पिछले साल 4 मार्च को मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया था और मामले को उचित समय के भीतर सुनने और निस्तारित करने के लिए कहा था।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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