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Coronavirus: मार्च में सख्ती बरती होती तो तबलीगी जमात के मरीजों को तलाशने के लिए मोमबत्ती नहीं जलानी पड़ती?

By प्रदीप द्विवेदी | Updated: April 4, 2020 08:00 IST

केवल प्रचारतंत्र पर फोकस केन्द्र सरकार के मुकाबले तो राज्य सरकारों ने बेहतर कार्य किया है. जहां राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने न केवल सबसे पहले लाॅक डाउन घोषित किया, बल्कि धैर्य के साथ समझदारी दिखाते हुए राहत के अनेक निर्णय भी लिए हैं.

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ठळक मुद्देकोरोना वायरस के अटैक ने कई लोगों की जान ली है, तो इसने प्रिंट मीडिया, पर्यटन जैसे उद्योग-धंधों को भी बेजान कर दिया है.अर्थव्यवस्था के साथ ऐसा अनर्थ नहीं होता, यदि केवल प्रचार पर फोकस केन्द्र सरकार जनवरी माह में कोरोना का पहला मरीज सामने आने के बाद ही इसे लेकर गंभीर हो जाती.

कोरोना वायरस के अटैक ने कई लोगों की जान ली है, तो इसने प्रिंट मीडिया, पर्यटन जैसे उद्योग-धंधों को भी बेजान कर दिया है. अर्थव्यवस्था के साथ ऐसा अनर्थ नहीं होता, यदि केवल प्रचार पर फोकस केन्द्र सरकार जनवरी माह में कोरोना का पहला मरीज सामने आने के बाद ही इसे लेकर गंभीर हो जाती. यदि फरवरी में सतर्क हो गए होते, तो मार्च में थाली नहीं बजानी पड़ती, मार्च में सख्ती बरती होती, तो अप्रैल में तबलीगी जमात के मरीजों को तलाशने मोमबत्ती नहीं जलानी पड़ती.

केवल प्रचारतंत्र पर फोकस केन्द्र सरकार के मुकाबले तो राज्य सरकारों ने बेहतर कार्य किया है. जहां राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने न केवल सबसे पहले लाॅक डाउन घोषित किया, बल्कि धैर्य के साथ समझदारी दिखाते हुए राहत के अनेक निर्णय भी लिए हैं.

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की विचारधारा से कोई असहमत हो सकता है, लेकिन कोरोना को फैलने से रोकने के लिए उन्होंने तत्काल जरूरी सख्त कदम उठाए हैं. इसी तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी जनता की जरूरतों को समझते हुए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं. अन्य कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी प्रदेश की आवश्यकताओं के सापेक्ष तत्काल प्रायोगिक कदम उठाए हैं.

इस वक्त चिंता की बात यह है कि तबलीगी जमात के कोरोना से ग्रसित लोग केवल कुछ जगहों तक सीमित नहीं रहे हैं, वरन एक दर्जन से ज्यादा राज्यों- राजस्थान, महाराष्ट्र, अंडमान निकोबार, दिल्ली, असम, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश में कोरोना प्रभावित मिले हैं. बड़ी समस्या यह है कि इनके संपर्क में आनेवाले कितने लोग हैं और कितने संक्रमित हुए हैं, इसके बारे में अनुमान लगाना आसान नहीं है, इसलिए कोरोना आफतकाल कई दिनों तक चल सकता है.

कोरोना वायरस के अटैक को लेकर तो केन्द्र सरकार पहले ही लापरवाही दिखा ही चुकी है, अब इसके मंदी, बेरोजगारी जैसे आर्थिक दुष्प्रभावों से निपटने के लिए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए, वरना स्वास्थ्य-व्यवस्था तो पहले ही बीमार हो चुकी है, अर्थ-व्यवस्था भी अस्पताल पहुंच जाएगी!

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