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प्रधानमंत्री का जम्मू कश्मीर के राजनीतिक नेताओं से चर्चा रचनात्मक पहल : आर्गेनाइजर पत्रिका

By भाषा | Updated: June 30, 2021 22:15 IST

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नयी दिल्ली, 30 जून प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल में जम्मू कश्मीर के 14 राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठक ‘एक रचनात्मक पहल’ थी लेकिन इस बारे में ‘सजग’ रहने की जरूरत है। आरएसएस से जुड़ी पत्रिका आर्गेनाइजर के संपादकीय में यह बात कही गई है ।

आर्गेनाइजर के संपादकीय में कहा गया है कि, ‘‘ नयी सीटों के लिये परिसीमन का कार्य जारी है । स्वभाविक तौर पर केंद्र सरकार राजनीतिक दलों को इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाना चाहती है।’’ इसमें कहा गया है कि चुनाव आयोग यह कार्य कर रहा है और वे (राजनीतिक दल) सुझाव दे सकते हैं और आपत्ति दर्ज करा सकते हैं ।

संपादकीय के अनुसार, ‘‘ ऐसा करते समय हमें अतीत के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए सजग रहने की जरूरत है। दोहरी बातें करने, पाकिस्तान के रूख का अनुसरण करने और जम्मू क्षेत्र के अधिकारों को नकारने की पुरानी आदत इतनी जल्दी नहीं जायेगी । ’’

उल्लेखनीय है कि जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने और उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के करीब दो वर्षो बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू कश्मीर के प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ पिछले सप्ताह बैठक की थी और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत बनाने को केंद्र की प्राथमिकता बतायी थी और इसके लिये जल्द परिसीमन को जरूरी बताया था ।

आरएसएस से जुड़ी पत्रिका के संपादकीय में कहा गया है, ‘‘अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को संशोधित करने और 35ए को खत्म करने के करीब दो वर्ष बाद मोदी सरकार ने रचनात्मक पहल की है और जम्मू कश्मीर के 14 राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ वार्ता की । ’’

इसमें कहा गया है कि प्रधानमंत्री का निमंत्रण स्वीकार करते हुए अब्दुल्ला और मुफ्ती की ओर से कोई किंतु और परंतु नहीं था ।

संपादकीय में कहा गया है कि निचले स्तर पर वैकल्पिक नेतृत्व के उभरने और 370 के बाद की स्थिति को लोगों द्वारा बढ़ती स्वीकार्यता के कारण भयादोहन किया जा रहा था तथा कश्मीर केंद्रित और स्वयं को पोषित करने वाले नेताओं द्वारा अपनी स्थिति के मद्देनजर ऐसा किया जा रहा था ।

इसमें कहा गया है कि सरकार ने विशेष दर्जा समाप्त करने के बाद से ही जम्मू कश्मीर के समावेशी विकास के लिये अनेक कदम उठाये हैं । ऐसे सभी कदमों के कारण लोगों को यह महसूस हुआ है कि विशेष दर्जे के नाम पर निहित स्वार्थी तत्व उन्हें बेवकूफ बना रहे थे । पत्रिका में कहा गया है कि सीमापार आतंकवाद में कमी आने और स्थानीय अलगाववाद को लोगों का समर्थन नहीं मिलने के कारण जमीन पर स्थिति बेहतर हुई है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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